Friday, August 6, 2010

लेकर नाम तेरा..

संजीदा सी ज़िन्दगी,
कुछ मैले से कपड़े,
फैले पड़े हैं टूटे ख़्वाबों के शीशे.
रहता हूं इन्हीं में लेकर के नाम तेरा।

सांसों का बोझ है ज़िन्दगी के कांधों पर,
बस ज़िंदा हूं मैं..लेकर के नाम तेरा।

जि़स्म की छाल पर वक्त की मार है,
दोज़क सी ज़िन्दगी इस कदर बेहाल है,
रोज़ गिरता..
फिर खड़ा..बस चल दिया...
लेकर के नाम तेरा।

करूं सजदा मैं किसका कोई मुझको बता दे,
हुनर है ये किसका जो लकीरें मिटा दे,
ख़ुदा पत्थरों में है रहता मैंने सुना,
हर पत्थर है चूमा..लेकर के नाम तेरा।

नहीं कोई शिक्वा जो मिल ना सके हम,
है एक नाम तेरा जो ले ना सके हम,
मगर याद तूने किया होगा हमको,
और तड़पेगा तू भी...........
लेकर के नाम मेरा...

Saturday, May 29, 2010

मेरा शरारती चांद

मेरा चांद बहुत शरारती है..
उसकी एक नज़र दिल चुराती है..
हंसी मोतियों सी बिखरती है..
जैसे माला टूट गिर पड़ती है..
लमहें बच्चों सा ज़िद करते हैं..
जब मुझसे रूठ वो चल देती है..

मेरा चांद बहुत शरारती है..

ज़ुबां का काम आंखों से लेती है..
कुछ ना कह कर भी सब कुछ कह देती है..
खुश है तो खुश है वो..
पर ज़रा सी बात पे वो रो देती है..

मेरा चांद बहुत शरारती है...


बहानों से मेरे इर्द-गिर्द मंडराती है..
पर मेरे पास जाने से बहाने बनाती है..
चाहती है मुझको भूलकर सबकुछ..
पूछो तो बाते बनाती है..

मेरा चांद बहुत शरारती है...

गुस्सा कहूं क्या..है इतना कि तौबा..
गैरों को आंखें दिखाती है..
और ज़रा कोई मेरे करीब आ के देखे..
तो शोलों सा खुदको जलाती है वो..

मेरा चांद बहुत शरारती है...


बलाकि हसीं है...
बलाकि अदाएं..
के हर सांस पर याद आती है वो...

मेरा चांद बहुत शरारती है...

Tuesday, May 18, 2010

ये रिश्ता अजीब है...

मिले जो हम कभी तो नसीब की लकीर है...
हुआ जो कुछ शुरू तो जल रहा रकीब है...

ये रिश्ता अजीब है...

तुझमें कुछ तो खा़स है..
हरपल मचलते जज़्बात हैं..
एक चुप का बयान हो तुम..
एहसासों का तुफान हो तुम..
रिश्तों की लपट में जलने से पहले..
एक पिता का कन्यादान हो तुम..
फिर भी मेरा अरमान हो तुम...

किसी के कहे से परेशान हो तुम..
पाप और पुन्य से अंजान हो तुम..
करते हो जो दिल कहता है..
फिर भी दिल की शरारतों से हैरान हो तुम...

ये रिश्ता अजीब है...

धसते जाते हो मेरी बातों के दलदल में...
तड़पते जाते हो दुनिया की उल्झन में..
लगाकर आग ये भूल जाते हो..कि
आग लगाने में तो दामन बच जाता है..
आग बुझाने में हाथ बच नहीं पाता है..

ये रिश्ता अजीब है...

Monday, May 17, 2010

यादें..

ज़िन्दगी के पन्नों को पलटा तो पाया नाम तेरा..
आई महक फिर तेरी..झूम उठा दिल मेरा..
याद आई बस वही शाम जिसमें हम मिले..
याद आया पल वही साथ जिसमें हम चले..
वक्त की रफ्तार को थाम लेना वो तेरा..

ज़िन्दगी के पन्नों को पलटा तो पाया नाम तेरा..

कदमों की आहट वो तेरी...
मुस्कुराहट वो तेरी..
पलके झुकाना वो तेरा..
बस कहते जाना वो तेरा..
याद आई बस मुझे वो बात मुलाकात की..

ज़िन्दगी के पन्नों को पलटा तो पाया नाम तेरा..

हुस्न तेरा क्या कहूं तू चांद पूनम की रात का..
होंठ तेरे बा-ख़ुदा भुला दें सब जो याद था..
आज बैठा मैं कहीं पीता रहा तेरे जाम बस..
जलवा मैं भूलूं कैसे अब तेरे हुस्न के सैलाब का..

ज़िन्दगी के पन्नों को पलटा तो पाया नाम तेरा..

भर ही जाती आंखें हैं जब भी हो आती याद तुम..
जल ही उठती थी वो दुनिया ऐसा मेरा यार था..

ज़िन्दगी के पन्नों को पलटा तो पाया नाम तेरा

Wednesday, May 5, 2010

जब वो मेरे सामने से जाता है..

जब वो मेरे सामने से जाता है..
जाने क्यों रोना आता है...

क्यों ये आंखें डबडबाने लगती हैं..
क्यों ये मुस्कुराहट जाने लगती है...

क्यों वक्त एक रकीब सा लगता है..
वो निकला चांद भी बदनसीब सा लगता है..

जब वो मेरे समाने से जाता है...

ज़ुबां पे लफ्ज़ कम पड़ जाते हैं..
कि रोक लूं उसको वो लफ्ज़ कहां आते हैं..

मेरे पहलू में गुज़रा वक्त यूं उठ चल देता है...
मानों सांसों को थाम के कोई जिने को कह देता है...

उस लम्हे को बटोरने को जी करता है..
उस वक्त को कैद करने को जी करता है..

जब वो मेरे समाने से जाता है...

उसे दूर तक जाते देखती हैं आंखें मेरी...
बस इंतज़ार ही बचता है जो दिल करता है...

जब वो मेरे सामने से जाता है..
जाने क्यों रोना आता है...

Thursday, April 1, 2010

बदनाम..

मुफलिसी में मुस्कुराना भी जाने क्या अंदाज़ है,
हाथों में खा़ली जाम है,और होंठों पर एक प्यास है।

एक झलक जो मिल जाती तो नींद आ जाती मुझे,
मैंने क्या सोचा था और कैसी गुज़री रात है।

मुफलिसी में मुस्कुराना भी जाने क्या अंदाज़ है

लफ्ज़ भारी हो गए दर्द के चलते मेरे,
नाम क्या होता के बस,शायर वो बदनाम है।

दर की ठोकर खाके भी नाम लेता वो तेरा,
बे-फिक्र बैठा तू कहीं क्या तुझको ये एहसास है।

मुफलिसी में मुस्कुराना भी जाने क्या अंदाज़ है

वो तेरा तकता रहा रस्ता ना जाने कबसे क्यों,
वादा करना..तोड़ देना,हुस्न का अंदाज़ है।

मौत पर ना उसकी तुम रोना कभी ओ बे-कदर,
प्यार वो करते जिया और प्यार करता मर गया।
बस लोग कहते रह गए..एक शायर वो बदनाम है।

मुफलिसी में मुस्कुराना भी जाने क्या अंदाज़ है

Thursday, March 25, 2010

ज़िंदगी अजीब है…

शायद ज़िदगी अजीब है..
या हम ही वो बदनसीब हैं..
जो समझ ना पाए कि अजीब ही नसीब है।

गर्म ज़मीन पर नंगे बदन लोटती
पेट की आग में आंसूओं को झोकती
शरीर की चमड़ी पर चाबुक सी पड़ती
क्या ज़िंदगी एक रकीब है..?

ये ज़िंदगी भी अजीब है।

कोई कहता पहेली इसे,
कोई बस जिए जाता है,
किसीको तो ये मिलती नहीं
जो जिना इसे चाहता है।

ये ज़िंदगी भी अजीब है।


या खिलखिलाती है ज़िंदगी
क्या मुस्कुराती है ज़िंदगी
नन्हे हाथों में नया जहां समाती है ज़िंदगी

किसी कवि की बिसात है ज़िंदगी
कभी शह तो कभी मात है ज़िंदगी
किसी से उदास है तो किसी पे महरबान है ज़िंदगी

ये ज़िंदगी भी अजीब है।