शायद ज़िदगी अजीब है..या हम ही वो बदनसीब हैं..
जो समझ ना पाए कि अजीब ही नसीब है।
गर्म ज़मीन पर नंगे बदन लोटती
पेट की आग में आंसूओं को झोकती
शरीर की चमड़ी पर चाबुक सी पड़ती
क्या ज़िंदगी एक रकीब है..?
ये ज़िंदगी भी अजीब है।
कोई कहता पहेली इसे,
कोई बस जिए जाता है,
किसीको तो ये मिलती नहीं
जो जिना इसे चाहता है।
ये ज़िंदगी भी अजीब है।
या खिलखिलाती है ज़िंदगी
क्या मुस्कुराती है ज़िंदगी
नन्हे हाथों में नया जहां समाती है ज़िंदगी
किसी कवि की बिसात है ज़िंदगी
कभी शह तो कभी मात है ज़िंदगी
किसी से उदास है तो किसी पे महरबान है ज़िंदगी
ये ज़िंदगी भी अजीब है।

