Thursday, March 25, 2010

ज़िंदगी अजीब है…

शायद ज़िदगी अजीब है..
या हम ही वो बदनसीब हैं..
जो समझ ना पाए कि अजीब ही नसीब है।

गर्म ज़मीन पर नंगे बदन लोटती
पेट की आग में आंसूओं को झोकती
शरीर की चमड़ी पर चाबुक सी पड़ती
क्या ज़िंदगी एक रकीब है..?

ये ज़िंदगी भी अजीब है।

कोई कहता पहेली इसे,
कोई बस जिए जाता है,
किसीको तो ये मिलती नहीं
जो जिना इसे चाहता है।

ये ज़िंदगी भी अजीब है।


या खिलखिलाती है ज़िंदगी
क्या मुस्कुराती है ज़िंदगी
नन्हे हाथों में नया जहां समाती है ज़िंदगी

किसी कवि की बिसात है ज़िंदगी
कभी शह तो कभी मात है ज़िंदगी
किसी से उदास है तो किसी पे महरबान है ज़िंदगी

ये ज़िंदगी भी अजीब है।

Wednesday, March 10, 2010

राहों की आंखों में भी मुकाम का ही ख़्वाब है

राहों की आंखों में भी मुकाम का ख़्वाब है,
होठों पे कैद लफ्ज़ों का बयान ही इंसाफ है,
मेरे दिल की आरज़ू के आखिरी अहसास तक,
तेरा इंतज़ार था बस तेरा इंतज़ार है।

राहों की आंखों में भी मुकाम का ही ख़्वाब है

अकसर मूंदे आंख मैं नज़दीक आ जाता तेरे,
पर सूरज की शरारतों से अकसर टूटा ख्वाब है।
तेरी ख़ूबसूरती की बात मैं अब क्या कहूं,
चांद को भी तेरे ऊपर अकसर होता नाज़ है।

राहों की आंखों में भी मुकाम का ही ख़्वाब है

मेरी हर दुआ में मेरे लिए ही कुछ ना था,
तुझको सब हासिल हो बस अब मेरा ये अरमान है।

राहों की आंखों में भी मुकाम का ही ख़्वाब है