Thursday, April 1, 2010

बदनाम..

मुफलिसी में मुस्कुराना भी जाने क्या अंदाज़ है,
हाथों में खा़ली जाम है,और होंठों पर एक प्यास है।

एक झलक जो मिल जाती तो नींद आ जाती मुझे,
मैंने क्या सोचा था और कैसी गुज़री रात है।

मुफलिसी में मुस्कुराना भी जाने क्या अंदाज़ है

लफ्ज़ भारी हो गए दर्द के चलते मेरे,
नाम क्या होता के बस,शायर वो बदनाम है।

दर की ठोकर खाके भी नाम लेता वो तेरा,
बे-फिक्र बैठा तू कहीं क्या तुझको ये एहसास है।

मुफलिसी में मुस्कुराना भी जाने क्या अंदाज़ है

वो तेरा तकता रहा रस्ता ना जाने कबसे क्यों,
वादा करना..तोड़ देना,हुस्न का अंदाज़ है।

मौत पर ना उसकी तुम रोना कभी ओ बे-कदर,
प्यार वो करते जिया और प्यार करता मर गया।
बस लोग कहते रह गए..एक शायर वो बदनाम है।

मुफलिसी में मुस्कुराना भी जाने क्या अंदाज़ है