Saturday, May 29, 2010

मेरा शरारती चांद

मेरा चांद बहुत शरारती है..
उसकी एक नज़र दिल चुराती है..
हंसी मोतियों सी बिखरती है..
जैसे माला टूट गिर पड़ती है..
लमहें बच्चों सा ज़िद करते हैं..
जब मुझसे रूठ वो चल देती है..

मेरा चांद बहुत शरारती है..

ज़ुबां का काम आंखों से लेती है..
कुछ ना कह कर भी सब कुछ कह देती है..
खुश है तो खुश है वो..
पर ज़रा सी बात पे वो रो देती है..

मेरा चांद बहुत शरारती है...


बहानों से मेरे इर्द-गिर्द मंडराती है..
पर मेरे पास जाने से बहाने बनाती है..
चाहती है मुझको भूलकर सबकुछ..
पूछो तो बाते बनाती है..

मेरा चांद बहुत शरारती है...

गुस्सा कहूं क्या..है इतना कि तौबा..
गैरों को आंखें दिखाती है..
और ज़रा कोई मेरे करीब आ के देखे..
तो शोलों सा खुदको जलाती है वो..

मेरा चांद बहुत शरारती है...


बलाकि हसीं है...
बलाकि अदाएं..
के हर सांस पर याद आती है वो...

मेरा चांद बहुत शरारती है...

Tuesday, May 18, 2010

ये रिश्ता अजीब है...

मिले जो हम कभी तो नसीब की लकीर है...
हुआ जो कुछ शुरू तो जल रहा रकीब है...

ये रिश्ता अजीब है...

तुझमें कुछ तो खा़स है..
हरपल मचलते जज़्बात हैं..
एक चुप का बयान हो तुम..
एहसासों का तुफान हो तुम..
रिश्तों की लपट में जलने से पहले..
एक पिता का कन्यादान हो तुम..
फिर भी मेरा अरमान हो तुम...

किसी के कहे से परेशान हो तुम..
पाप और पुन्य से अंजान हो तुम..
करते हो जो दिल कहता है..
फिर भी दिल की शरारतों से हैरान हो तुम...

ये रिश्ता अजीब है...

धसते जाते हो मेरी बातों के दलदल में...
तड़पते जाते हो दुनिया की उल्झन में..
लगाकर आग ये भूल जाते हो..कि
आग लगाने में तो दामन बच जाता है..
आग बुझाने में हाथ बच नहीं पाता है..

ये रिश्ता अजीब है...

Monday, May 17, 2010

यादें..

ज़िन्दगी के पन्नों को पलटा तो पाया नाम तेरा..
आई महक फिर तेरी..झूम उठा दिल मेरा..
याद आई बस वही शाम जिसमें हम मिले..
याद आया पल वही साथ जिसमें हम चले..
वक्त की रफ्तार को थाम लेना वो तेरा..

ज़िन्दगी के पन्नों को पलटा तो पाया नाम तेरा..

कदमों की आहट वो तेरी...
मुस्कुराहट वो तेरी..
पलके झुकाना वो तेरा..
बस कहते जाना वो तेरा..
याद आई बस मुझे वो बात मुलाकात की..

ज़िन्दगी के पन्नों को पलटा तो पाया नाम तेरा..

हुस्न तेरा क्या कहूं तू चांद पूनम की रात का..
होंठ तेरे बा-ख़ुदा भुला दें सब जो याद था..
आज बैठा मैं कहीं पीता रहा तेरे जाम बस..
जलवा मैं भूलूं कैसे अब तेरे हुस्न के सैलाब का..

ज़िन्दगी के पन्नों को पलटा तो पाया नाम तेरा..

भर ही जाती आंखें हैं जब भी हो आती याद तुम..
जल ही उठती थी वो दुनिया ऐसा मेरा यार था..

ज़िन्दगी के पन्नों को पलटा तो पाया नाम तेरा

Wednesday, May 5, 2010

जब वो मेरे सामने से जाता है..

जब वो मेरे सामने से जाता है..
जाने क्यों रोना आता है...

क्यों ये आंखें डबडबाने लगती हैं..
क्यों ये मुस्कुराहट जाने लगती है...

क्यों वक्त एक रकीब सा लगता है..
वो निकला चांद भी बदनसीब सा लगता है..

जब वो मेरे समाने से जाता है...

ज़ुबां पे लफ्ज़ कम पड़ जाते हैं..
कि रोक लूं उसको वो लफ्ज़ कहां आते हैं..

मेरे पहलू में गुज़रा वक्त यूं उठ चल देता है...
मानों सांसों को थाम के कोई जिने को कह देता है...

उस लम्हे को बटोरने को जी करता है..
उस वक्त को कैद करने को जी करता है..

जब वो मेरे समाने से जाता है...

उसे दूर तक जाते देखती हैं आंखें मेरी...
बस इंतज़ार ही बचता है जो दिल करता है...

जब वो मेरे सामने से जाता है..
जाने क्यों रोना आता है...