Wednesday, October 28, 2009

काश वो होती..तो देखती मैं बदल गया हूं

आज कहने को बहुत कुछ है पर कोई सुनने वाला नहीं,
कल सुनने वाला था तो कहा नहीं जाता था,
इस कहने और सुनने के बीच...कुछ था,
तो वो प्यार था..और वो भी बेशुमार था।
जो आज भी है...
कुछ नहीं है....
तो वो नहीं है.....

आज भी यादों की पोटली सर पे लिए फिरता हूं मैं,
घर जो लौटता हूं..तो उसका इंतजार याद आ जाता है,
घंटों इंतजार करती वो आंखें..जो देखते ही मुझे खिल जाया करती थीं,
मेरे आते ही उसका शिकायत करना,
मेरा हमेशा की तरह सुन के अनसुना कर देना,
वो कहते कहते चुप हो जाया करती थी,
मेरे एक जवाब के लिए खुद को तरसाया करती थी,
पर जाने मैं किस धुन में रहता था,
ज़िन्दगी की उधेड़-बुन रहता था।

बहुत कुछ पा सकता था पर खोता चला गया,
चंद रुपयों के लिए रोता चला गया,
सोचा था पैसों से मुहब्बत और रंग लाती है,
क्या पता था..पैसों से दूरियां और बढ़ जाती हैं।

कल वो थी तो पैसे नहीं हुआ करते थे,
आज पैसे हैं..तो वो नहीं है...
इस पाने और खोने के बीच...
अगर कुछ है...तो आज भी प्यार है...
और वो भी बेशुमार है।

खुदा गुनाहों की सज़ा कुछ इस कदर देता है,
कि सबकुछ देकर के तुझे...तेरा सबकुछ ले लेता है।

Friday, October 23, 2009

कमरा..

मैं सोचता हूं अपना कमरा बदल लूं..
शाम होते ही दीवारें चीखने लगतीं हैं,
उसके आने की राह तकता दिखता है दरवाज़ा मेरा,
खिड़कियों से झांकती दिखतीं हैं खुशबू उसी की,
और आईना अक्स मेरा ही छुपा देता है,
कि कहीं चेहरे पर आज भी वही प्यार ना दिख जाए।
अब मैं सोचता हूं अपना कमरा बदल लूं..

रातों को दबे पांव वो जाने कैसे आता है,
जबकि सिटकनी हाथों से खुद लगाके सोता हूं,
वैसे नींद का आना भी जैसे करामात है,
वो भी तभी आती है जब वो ख्वाबों में आता है,
अब सोचता हूं अपना कमरा बदल लूं..

मशरूफ रहकर सुबह तो अपनी काट देता हूं,
पर शाम होते ही फिर उसी तनहाई का डर साथ होता है,
पैर उठते हैं..रुकतें हैं..उसी कमरे पे जाने से,
कभी ज़िन्दगी की जहां हमने हसीन शाम देखी थी,
वो जो आया था तो ऐसा जादू लाया था,
कि मेरी हर चीज़ को मेरी तरह दिवाना कर गया,
अब सोचता हूं अपना कमरा बदल ही लूं..

Thursday, October 22, 2009

मुझे फर्क नहीं पड़ता...

उसके होने या ना होने से मुझे फर्क नहीं पड़ता,
दिल तड़पता है पर एक आंसू नहीं टपकता,
मगर उसके होने या ना होने से मुझे फर्क नहीं पड़ता।

बिन बुलाए वो आया था,
और बिन बताए वो चला गया,
उसका हर समान पड़ा है मेरे दिल के खा़ने में,
और रखा है हिफाज़त से तकीये के सिरहाने में,
मगर उसके होने या ना होने से मुझे फर्क नहीं पड़ता।

वो गया तो यूं गया..
कि सुबाह आम हो गई,
शामें जाने कब ढ़ली..जाने कब रात हो गई,
कहीं भी दिल नहीं लगता..कोई बता दे फिर रस्ता।
मगर उसके होने या ना होने से मुझे फर्क नहीं पड़ता।

नाम किसी का भी मैं लूं,
याद उसी की आती है,
प्यार उसी से करता हूं,
मेरी धड़कन बताती है,
वजह लिखने की खो बैठा,
कलम पकड़ा नहीं जाता,
और एक भी अकशर काग़ज़ पे उतर नहीं पाता।
मगर उसके होने या ना होने से मुझे फर्क नहीं पड़ता।

कलम फिर जो थामा है,
वजह लिखने की फिर वो है,
कि उसको याद करना बन चुकी आदत है अब मेरी।
और अब नहीं बोलूंगा कभी..कि..
उसके होने या ना होने से मुझे फर्क नहीं पड़ता।