उसके होने या ना होने से मुझे फर्क नहीं पड़ता,दिल तड़पता है पर एक आंसू नहीं टपकता,
मगर उसके होने या ना होने से मुझे फर्क नहीं पड़ता।
बिन बुलाए वो आया था,
और बिन बताए वो चला गया,
उसका हर समान पड़ा है मेरे दिल के खा़ने में,
और रखा है हिफाज़त से तकीये के सिरहाने में,
मगर उसके होने या ना होने से मुझे फर्क नहीं पड़ता।
वो गया तो यूं गया..
कि सुबाह आम हो गई,
शामें जाने कब ढ़ली..जाने कब रात हो गई,
कहीं भी दिल नहीं लगता..कोई बता दे फिर रस्ता।
मगर उसके होने या ना होने से मुझे फर्क नहीं पड़ता।
नाम किसी का भी मैं लूं,
याद उसी की आती है,
प्यार उसी से करता हूं,
मेरी धड़कन बताती है,
वजह लिखने की खो बैठा,
कलम पकड़ा नहीं जाता,
और एक भी अकशर काग़ज़ पे उतर नहीं पाता।
मगर उसके होने या ना होने से मुझे फर्क नहीं पड़ता।
कलम फिर जो थामा है,
वजह लिखने की फिर वो है,
कि उसको याद करना बन चुकी आदत है अब मेरी।
और अब नहीं बोलूंगा कभी..कि..
उसके होने या ना होने से मुझे फर्क नहीं पड़ता।

2 comments:
भाई फर्क तो पड्ता है .......पर आपके फर्क नही पडने का भी गहरा एहसास है .......सुन्दर भाव!
hmmm nice one... u r 2 gud with words:-)
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