Friday, November 27, 2009

ज़हन के ज़ख्म...

आंखें भरीं हैं..पर लब मुस्कुरातें हैं,
हाथों में थामें शमा..हम अमन चाहतें हैं,
चंद लोगों ने क्या खीचीं लकीरें ज़मी पर,
हम अभी तक उस की कीमत चुकातें हैं।

आंखें भरीं हैं..पर लब मुस्कुरातें हैं,

आतंक ही आतंक फैला है.. इस कदर,
कि बारिश में भी लाल छीटें आतें हैं,
लाल हो चला है आसमान सारा,
और लोग ख़ून के धब्बों पे पोछे लगातें हैं

आंखें भरीं हैं..पर लब मुस्कुरातें हैं,

ये कैसी प्यास है जो लोगों के ख़ून से बुझती है,
चंद लोग इसे ख़ुदा का काम बतातें हैं,
वो कौन सी किताब है जो ख़ून में सनी हो,
जबकि कुराने शरिफ के फलसफे वो भुलातें हैं

आंखें भरीं हैं..पर लब मुस्कुरातें हैं,

बस आयो सब भूलकर हम गले मिल जाएं,
जैसे दो बिछड़े भाई गले लग मुस्कुराते हैं।
आंखें भरीं हैं..पर लब मुस्कुरातें हैं।

1 comment:

Udan Tashtari said...

एक उम्दा रचना...


एक सच्ची श्रृद्धांजलि!!