Sunday, December 20, 2009

खनक..

आवाज़ लाख़ सुनी मैंने..पर तेरी आवाज़ की खनक का.. क्या कहना
कानों से उतरी जो दिल में उस दर्दे-जिगर का..क्या कहना
शबनम से पाक तेरे बोल..ख़ुदा की उस आमद का..क्या कहना

अपने नाम को मुकम्मल सा पाता हूं,
जो तेरी ज़ुबान से सुन फिर जी जाता हूं,
कि अब उस अंदाजे़ बयान का..क्या कहना।

तू ख़ुदा तो नहीं कहीं इन्सान के लिबास में..
कि तेरी नूरे नज़र का..क्या कहना..
अब तो लिखतें हैं गज़लें शायर तेरे हुस्ने-शबाब पे..
कि कागज़ पे उतरा जो तू तो ..क्या कहना।

कभी करो ज़िक्र महफिल में तो तारीफों के पुलिंदे,
अब तो शहर हुआ ग़ुलाम तेरा कि.. क्या कहना।
आज देखा था चांद छुप रहा था बादल में,
कि तू आया था छत पे कि क्या कहना।

शरमाती सी आंखें जो मिल जाएं किसी से,
करदें यूं मुरीद कि क्या कहना।
कि तुझे करूं तो करूं बयान किन लफ्ज़ों में,
कि बस तेरा नाम ही बहुत है..कि अब क्या कहना।

Sunday, December 13, 2009

वो किसी और का है..

आज एक इंतज़ार ख़त्म हो गया,
उसके आने का.....
एक उम्मीद थी जो टूट के गिर पड़ी,
उसने हस्ते हस्ते जो अलविदा कह दिया।

मैंने कितने सपने यूं ही सजाए थे..
एक नकली सी दुनिया बसाई थी..
करके इंतज़ार हर रात उसको,
हर राह पे शमा जलाई थी।

अचानक से आज वो टकरा गई थी,
लगा दुनिया में मेरी फिर वो गई थी,
मगर उसकी बातों में नाम कोई और ही था,
जिसे बता के मुझे वो शरमा रही थी।

आज एक इंतज़ार खत्म हो गया..
उसके आने का।