आवाज़ लाख़ सुनी मैंने..पर तेरी आवाज़ की खनक का.. क्या कहनाकानों से उतरी जो दिल में उस दर्दे-जिगर का..क्या कहना
शबनम से पाक तेरे बोल..ख़ुदा की उस आमद का..क्या कहना
अपने नाम को मुकम्मल सा पाता हूं,
जो तेरी ज़ुबान से सुन फिर जी जाता हूं,
कि अब उस अंदाजे़ बयान का..क्या कहना।
तू ख़ुदा तो नहीं कहीं इन्सान के लिबास में..
कि तेरी नूरे नज़र का..क्या कहना..
अब तो लिखतें हैं गज़लें शायर तेरे हुस्ने-शबाब पे..
कि कागज़ पे उतरा जो तू तो ..क्या कहना।
कभी करो ज़िक्र महफिल में तो तारीफों के पुलिंदे,
अब तो शहर हुआ ग़ुलाम तेरा कि.. क्या कहना।
आज देखा था चांद छुप रहा था बादल में,
कि तू आया था छत पे कि क्या कहना।
शरमाती सी आंखें जो मिल जाएं किसी से,
करदें यूं मुरीद कि क्या कहना।
कि तुझे करूं तो करूं बयान किन लफ्ज़ों में,
कि बस तेरा नाम ही बहुत है..कि अब क्या कहना।

5 comments:
अब तो लिखतें हैं गज़लें शायर तेरे हुस्ने-शबाब पे..
कि कागज़ पे उतरा जो तू तो ..क्या कहना .....
आपकी इस खूबसूरत नज़्म का कहना ...... बहुत लाजवाब है ...
उम्दा अंदाज में हुस्न की तारीफ
एक निवेदन
कृपया वर्ड-वेरिफिकेशन हटा लीजिये
वर्ड वेरीफिकेशन हटाने के लिए:
डैशबोर्ड>सेटिंग्स>कमेन्टस>Show word verification for comments?>
इसमें ’नो’ का विकल्प चुन लें..बस हो गया..कितना सरल है न हटाना
और उतना ही मुश्किल-इसे भरना!! यकीन मानिये
you are the best i ever seen.....
मेरे हर हर्फ में तेरी खुशबू है
लबों पर सिर्फ तेरी ही मुस्कराहट है
तू मेरी ज़िद है
तू मेरी हठ है
क्योंकि तू उस शाम की पहली खनक है...
Post a Comment