Friday, January 15, 2010

आने वाला कल..क्या ऐसा होगा ?

घुटनों पर गिर पड़ा है कल,
फिर भी वो कहतें हैं कि हम हैं सफल
रोज़ सिगनल पे उगता है कल का सूरज,
और रोटी कि है वही जद्दोजहद,
जो बचपन कभी मुल्क का मुकद्दर बन पाते,
वो रहते हैं ग़रीबी में दरबदर

फिर भी वो कहतें हैं कि हम हैं सफल

सिर्फ इंसान की औलाद होके क्या पाएगा
पैसों से बनते हैं भगवान भी आजकल
वैसे तो माजरा बस भूख का है,
किसी के लिये ये दो रोटी है..
तो किसी की मिटती नहीं हवस उम्र भर
धोखा,फरेब,लालच..बन चुके हैं गुन अब तो,
पिता ने दिये थे जो गुन वो कहां रहे कारगर

कभी शीशे उतारो तो देखो बाहर हो रहा है क्या ?
सर्द जाड़े में अकड़ गया है वो बुज़ुर्ग इसकदर

फिर भी वो कहतें हैं कि हम हैं सफल

Friday, January 1, 2010

न्यू ईयर

एक गया तो फिर एक आया है,
नया साल कितने आगाज़ लाया है,
पिछले ने रुलाया ये कहा हमने,
नया हसाएगा ये उम्मीद लाया है
एक गया तो फिर एक आया है।

कई बातों के बीच गुज़रा जो कल
आज तो सुरज भी निकल इतराया है।
मेरे हाथों से जो छूट के गिर पड़े थे पल,
बटोर के हथेलियों में फिर से सजाया है,
एक गया तो फिर एक आया है।

चांद की अब चांदनी भी छनकर आने लगी
तुने जो शरमा के अपने चेहरे को छुपाया है
एक गया तो फिर एक आया है।