Thursday, March 25, 2010

ज़िंदगी अजीब है…

शायद ज़िदगी अजीब है..
या हम ही वो बदनसीब हैं..
जो समझ ना पाए कि अजीब ही नसीब है।

गर्म ज़मीन पर नंगे बदन लोटती
पेट की आग में आंसूओं को झोकती
शरीर की चमड़ी पर चाबुक सी पड़ती
क्या ज़िंदगी एक रकीब है..?

ये ज़िंदगी भी अजीब है।

कोई कहता पहेली इसे,
कोई बस जिए जाता है,
किसीको तो ये मिलती नहीं
जो जिना इसे चाहता है।

ये ज़िंदगी भी अजीब है।


या खिलखिलाती है ज़िंदगी
क्या मुस्कुराती है ज़िंदगी
नन्हे हाथों में नया जहां समाती है ज़िंदगी

किसी कवि की बिसात है ज़िंदगी
कभी शह तो कभी मात है ज़िंदगी
किसी से उदास है तो किसी पे महरबान है ज़िंदगी

ये ज़िंदगी भी अजीब है।

3 comments:

Amitraghat said...

अच्छा लिखा..........."
amtraghat.blogspot.com

कृष्ण मुरारी प्रसाद said...

विल्कुल अजीब है जी.....
.....
यह पोस्ट केवल सफल ब्लॉगर ही पढ़ें...नए ब्लॉगर को यह धरोहर बाद में काम आएगा...
http://laddoospeaks.blogspot.com/2010/03/blog-post_25.html
लड्डू बोलता है ....इंजीनियर के दिल से....

श्यामल सुमन said...

संघर्ष न किया तो धिक्कार जिन्दगी है
काँटों का सेज फिर भी स्वीकार जिन्दगी है

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com