जब वो मेरे सामने से जाता है..जाने क्यों रोना आता है...
क्यों ये आंखें डबडबाने लगती हैं..
क्यों ये मुस्कुराहट जाने लगती है...
क्यों वक्त एक रकीब सा लगता है..
वो निकला चांद भी बदनसीब सा लगता है..
जब वो मेरे समाने से जाता है...
ज़ुबां पे लफ्ज़ कम पड़ जाते हैं..
कि रोक लूं उसको वो लफ्ज़ कहां आते हैं..
मेरे पहलू में गुज़रा वक्त यूं उठ चल देता है...
मानों सांसों को थाम के कोई जिने को कह देता है...
उस लम्हे को बटोरने को जी करता है..
उस वक्त को कैद करने को जी करता है..
जब वो मेरे समाने से जाता है...
उसे दूर तक जाते देखती हैं आंखें मेरी...
बस इंतज़ार ही बचता है जो दिल करता है...
जब वो मेरे सामने से जाता है..
जाने क्यों रोना आता है...

3 comments:
waah saurabh ji bahut achcha prayas ...likhte rahiye...
jab vo mere samne se jata hai sach mein kisi sach se hi roobaroo karata hai ...gud one
you still write awsome
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