Tuesday, May 18, 2010

ये रिश्ता अजीब है...

मिले जो हम कभी तो नसीब की लकीर है...
हुआ जो कुछ शुरू तो जल रहा रकीब है...

ये रिश्ता अजीब है...

तुझमें कुछ तो खा़स है..
हरपल मचलते जज़्बात हैं..
एक चुप का बयान हो तुम..
एहसासों का तुफान हो तुम..
रिश्तों की लपट में जलने से पहले..
एक पिता का कन्यादान हो तुम..
फिर भी मेरा अरमान हो तुम...

किसी के कहे से परेशान हो तुम..
पाप और पुन्य से अंजान हो तुम..
करते हो जो दिल कहता है..
फिर भी दिल की शरारतों से हैरान हो तुम...

ये रिश्ता अजीब है...

धसते जाते हो मेरी बातों के दलदल में...
तड़पते जाते हो दुनिया की उल्झन में..
लगाकर आग ये भूल जाते हो..कि
आग लगाने में तो दामन बच जाता है..
आग बुझाने में हाथ बच नहीं पाता है..

ये रिश्ता अजीब है...

1 comment:

दिलीप said...

waah shaandaar gazal...