Sunday, September 6, 2009

तेरे इश्क में..

रोज़ की ठोकर से संभलने की अदा सीख गया हूं,
अब तो गुरबत में भी जीने की अदा सीख गया हूं,
मुसीबत रोज़ नए लिबास बदल आ जाती है,
अब मैं भी बहरूपिये सा हुनर सीख गया हूं।

आदत पड़ चुकी है दर्द को सह जाने की,
ज़ख्म नासूर से रहकर भी मुस्कुराते हैं,
मैं रोज़ फैली सी ज़िन्दगी को समेट लेता हूं,
मगर कुछ फलसफे हैं जो,फिर भी बीखर जातें हैं।

हर शक्स मुझे नए सबक दे जाता है,
दर्द देता है तो मरहम भी दे जाता है,
मैं अकसर वक्त को मुजरिम सा खड़ा पाता हूं,
जब मैं पीठ पर ख़न्जर सा भुंका पाता हूं।

बस एक उम्मीद है बाकी अब तेरे आने की,
तेरी चाहत है वजह मेरे पास जिये जाने की,
तेरी शक्ल आज भी नहीं बन पाती मुझसे,
बस तेरा नाम ही मुकम्मल है उमर गुज़ारने के लिए।

7 comments:

अपूर्व said...

मुसीबत रोज़ नए लिबास बदल आ जाती है,
अब मैं भी बहरूपिये सा हुनर सीख गया हूं।

वाह! कई अनुभव आपने एक साथ पिरो दिये हैं अपनी कविता मे...

Mithilesh dubey said...

बहुत ही सुन्दर रचना। साथ मे आपके द्वारा लगायी गयी तस्विर.........

Udan Tashtari said...

बेहतरीन रचना...

वाणी गीत said...

हर शख्स नया सबक दे जाता है ..नए सबक लेकर जिंदगी को और बेहतर कविताओं का उपहार देते जाएँ इसी तरह ..शुभकामनायें !!

Pramendra Pratap Singh said...

बहुत ही अच्‍छी रचना है है मित्र

महेन्द्र मिश्र said...

बहुत ही सुन्दर रचना....

M VERMA said...

मुसीबत रोज़ नए लिबास बदल आ जाती है,
अब मैं भी बहरूपिये सा हुनर सीख गया हूं।
बहुत सुन्दर भाव. मुसीबतो का सामना करने के लिये तो बहुरूपिये का हुनर आना ही चाहिये.