Friday, October 23, 2009

कमरा..

मैं सोचता हूं अपना कमरा बदल लूं..
शाम होते ही दीवारें चीखने लगतीं हैं,
उसके आने की राह तकता दिखता है दरवाज़ा मेरा,
खिड़कियों से झांकती दिखतीं हैं खुशबू उसी की,
और आईना अक्स मेरा ही छुपा देता है,
कि कहीं चेहरे पर आज भी वही प्यार ना दिख जाए।
अब मैं सोचता हूं अपना कमरा बदल लूं..

रातों को दबे पांव वो जाने कैसे आता है,
जबकि सिटकनी हाथों से खुद लगाके सोता हूं,
वैसे नींद का आना भी जैसे करामात है,
वो भी तभी आती है जब वो ख्वाबों में आता है,
अब सोचता हूं अपना कमरा बदल लूं..

मशरूफ रहकर सुबह तो अपनी काट देता हूं,
पर शाम होते ही फिर उसी तनहाई का डर साथ होता है,
पैर उठते हैं..रुकतें हैं..उसी कमरे पे जाने से,
कभी ज़िन्दगी की जहां हमने हसीन शाम देखी थी,
वो जो आया था तो ऐसा जादू लाया था,
कि मेरी हर चीज़ को मेरी तरह दिवाना कर गया,
अब सोचता हूं अपना कमरा बदल ही लूं..

1 comment:

Udan Tashtari said...

शायद ही कुछ राहत लगे कमरा बदलने से..फिर भी कोशिश करके देखो..शायद एक और ऐसी ही बेहतरीन रचना रच जाये...कि कमरा बदल कर देख लिया... :)