घुटनों पर गिर पड़ा है कल,फिर भी वो कहतें हैं कि हम हैं सफल
रोज़ सिगनल पे उगता है कल का सूरज,
और रोटी कि है वही जद्दोजहद,
जो बचपन कभी मुल्क का मुकद्दर बन पाते,
वो रहते हैं ग़रीबी में दरबदर
फिर भी वो कहतें हैं कि हम हैं सफल
सिर्फ इंसान की औलाद होके क्या पाएगा
पैसों से बनते हैं भगवान भी आजकल
वैसे तो माजरा बस भूख का है,
किसी के लिये ये दो रोटी है..
तो किसी की मिटती नहीं हवस उम्र भर
धोखा,फरेब,लालच..बन चुके हैं गुन अब तो,
पिता ने दिये थे जो गुन वो कहां रहे कारगर
कभी शीशे उतारो तो देखो बाहर हो रहा है क्या ?
सर्द जाड़े में अकड़ गया है वो बुज़ुर्ग इसकदर
फिर भी वो कहतें हैं कि हम हैं सफल

3 comments:
कभी शीशे उतारो तो देखो बाहर हो रहा है क्या ?
सर्द जाड़े में अकड़ गया है वो बुज़ुर्ग इसकदर
फिर भी वो कहतें हैं कि हम हैं सफल
-कितना आईना दिखाओगे भाई!!
उनके घुटनों की उस अकड़ का क्या कहना
उन्होंने तो सीखा ही नहीं कभी घुटनों के बल चलना...http://khabarloongasabki.blogspot.com/
जो बचपन कभी मुल्क का मुकद्दर बन पाते,
वो रहते हैं ग़रीबी में दरबदर...
behad sanjeeda nazm...khobsoorat abhivyakti...
Mere blog par aane aur sunder vichaar rakhne ke liye bhi shukriya...
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