Friday, February 12, 2010

एक अजीब सा सन्नाटा है

एक अजीब सा सन्नाटा है..
जाने सब थम सा गया है..
एक शोर चुप-चाप बैठा है..
जरूर कहीं एक घर उजड़ा होगा..
किसी तुफान ने अपना हशर छोड़ा होगा..

कि कहीं एक अजीब सा सन्नाटा है

आवाज़ें अब कोई नहीं करता..
हर जिस्म में वो इंसान सो गया है..
कभी कभी परिंदों की चैहकन..
सन्नाटे के शीशे तोड़ जाती है..
कभी कभी .....
हवा के पैरों की आहट..
हलचल सी पैदा कर जाती है..

कि कहीं एक अजीब सा सन्नाटा है

रात खंडहर सी टूटी पड़ी है..
दरीचों के जालों से चांद घिरा सा लगता है..
कई निशान वक्त के बिखरे पड़े हैं...
जाने कोई उनमें बीता सा लगता है..

चारों तरफ एक अजीब सा सन्नाटा है

4 comments:

Udan Tashtari said...

एक शोर चुपचाप बैठा है...बेहद अनूठा प्रयोग.

बेहतरीन रचना.

महाशिवरात्री की आपको बहुत शुभकामनाएँ.

परमजीत सिहँ बाली said...

बहुत बढ़िया रचना!!बधाई।


महाशिवरात्री की आपको बहुत शुभकामनाएँ.

दिगम्बर नासवा said...

रात खंडहर सी टूटी पड़ी है..
दरीचों के जालों से चांद घिरा सा लगता है..
कई निशान वक्त के बिखरे पड़े हैं...
जाने कोई उनमें बीता सा लगता है..

शोर करता हुवा सन्नाटा ..... मन की वादियों में उतरता हुवा ..... बहुत शानदार रचना है ....

Nitesh Sinha said...

भई वाह...सन्नाटे जब चीखेंगे तभी तो शोर चुपचाप बैठेगा...वैसे आपकी कल्पनाशीलता का जवाब नहीं...झाम