Sunday, August 30, 2009

इज़हार..

जाने क्या अब होने को है,
दिल उदास है तो रोने को है,
उसकी एक झलक की ख़तिर
सारी दुनिया खंगोलने को है..
जाने क्या अब होने को है।

रोज़ की आदतों में शुमार है वो भी,
करता है प्यार पर छुपाता है वो भी,
हमेशा करके बाते इधर-उधर की,
बातों में अपनी उलझाता है वो भी।
जाने क्या अब होने को है।

अकसर लोग प्यार किया करतें हैं,
छुपातें है उन्ही से जिनसे बे-शुमार किया करतें हैं,
लूंगा सबक अब दुनिया से मैं भी,
और कह दूंगा की हां मुझे प्यार है तुमसे।

Saturday, August 29, 2009

क्या होगा तेरे इंतज़ार में ?

क्या होगा तेरे इंतज़ार में ?
उनका ज़िक्र मेरी बातों में मिल जाएगा,
उनका नाम अनायास ही मेरे हाथों से लिख जाएगा,
हूंगा मशरूफ दुनिया की भीड़ में,
पर एक चेहरा उनका भी दिख जाएगा,

यही होगा तेरे इंतज़ार में।

कहते-कहते कभी रुक जाया करूंगा,
दुनिया जो पुछेगी तो बहलाया करूंगा,
अकसर बताकर आंसूओं को पानी,
हंसके उन्हें पी जाया करूंगा,

यही होगा तेरे इंतज़ार में।

सूरज जो डूबेगा तो दिल उदास होगा,
शाम जो होगी तो दर्द पास होगा,
दीवारों को तकेंगी आंखें मेरी,
बस रात भर ख़्यालों में तू साथ होगा,

यही होगा तेरे इंतज़ार में।

कभी तुझे भी तो मैं याद आता हूंगा,
ना चाहतें हुए भी तुझे तड़पाता हूंगा,
बहानों से लेती तो होगी नाम मेरा,
बस ज़िक्र ही सही,
कुछ वक्त तेरे साथ तो बिताता हूंगा।

Wednesday, August 26, 2009

तेरे लिए..

आज नए रास्तों की तलाश में फिर भटक गया,
जाने क्या सोचा था,जाने क्या हो गया,
अब सब फैला सा दिखता है मुझे,
कुछ बिखरे से रिशते,
एक टूटा सा लम्हा,
और उसके कहे आखिरी लफ्ज़,
इन्हें हर कोने में तलाशता हूं,
और रखा कहां अकसर भूल जाता हूं,
आज नए रास्तों की तलाश में फिर भटक गया।


रोज़ एक नए सवाल में उलझता जाता हूं,
ज़िन्दगी एक पहेली है अब समझ में आता है,
एक टक देखकर लकीरों को अपनी,
उन्हें बदल देने को जी चाहता है,
वैसे खुदा की रहमतों से तो ताल्लुक ना हुआ,
और उसने जो दर्द दिया हमने उसे ही खुदा जाना,
आज नए रास्तों की तलाश में फिर भटक गया।

अब बस ज़िन्दा हूं तो जिए जाता हूं,
वक्त से कुछ मिला होता तो हंसके जी पाता,
लोग जीने की फरीयाद किया करतें हैं,
और मैं मरने की आरज़ू भी कर नहीं पाता।

अब बस इतना बता दे कोई...कि
खुदा गर बेरहम नहीं,
तो फिर वक्त के ज़ुल्म क्या हैं।

Saturday, August 15, 2009

मेरा चांद

छत पर एक रात मैं...
चांद को एक टक निहार रहा था,
शायद तेरा ही चैहरा तलाश रहा था,
बीच में टूटे बादल उसे छुपाते दिखते थे,
जैसे तूने शरमां के परदा किया हो..
तुमने बताया था कि तुमहें कोई यूं देखे..
तो तुम बहुत शरमाते हो..
यही सोच शायद आज जी भर के तुम्हे शरमाते देखा।
छत पर एक रात मैं...

उस रात तूने सितारों की ओढ़नी ओढ़ी थी,
पूरा आकाश तेरा दामन सा नज़र आता था,
रात भर चांदनी का जाम लिए मैं बैठा रहा,
नशा बढ़ता रहा और मैं चांद को तकता रहा।
छत पर एक रात मैं...


अब रोज़ चांद को यूं ही निहारता हूं...
कि कभी तो तुम भी यूं उस चांद को निहारते होगे,
करके याद मुझे तुम भी कभी छत पे तो आते होगे।

क्या हुआ जो हम मिल ना सके...
आदत ही सही पर उमर गुज़र जाएगी।

Friday, August 14, 2009

तेरी अमानत..

तुम तो चले जाते हो,
पर अपने पीछे छोड़ जाते हो कुछ कीमती सामान,
अपनी खुशबू जो दिनों तक मेरे कमरे में रह जाती है,
वो सिलवटें जिनमें तेरी करवटें नज़र आतीं हैं,
वो तेरा नूर शजर पे रौशन सा रहता है,
और हर तरफ,
तेरी हंसी की आवाज़ें मंडरातीं है,
तुम तो चले जाते हो...।

मुझे तेरी ज़ुल्फों के निशान लिहाफों में मिल जातें हैं,
चुनकर उनकों हिफाज़त से संजो लेता हूं,
और करके याद गुज़रे लम्हों को,
फिर से उन्ही लम्हों को जी लेता हूं,
तुम तो चले जाते हो...।

कभी एक आंसू गिरा था तेरा,
मैनें अमानत सा रखा है,
उससे कीमती कुछ मेरा कहां है,
जो कभी आओगे वापस तो सब वैसा ही पाओगे,
तेरी हर चीज़ की हिफाज़त मैं करता हूं बरसों से,
बस तुझे लौटा के मैं सब कुछ,
दुनिया से विदा लूंगा।

Saturday, August 8, 2009

लफ्ज़ों में रहता हूं..

जब कभी मेरे लफ्ज़ों को दौहराओगी,
मुझे अपने सामने खड़ा पाओगी,
हर एक लफ्ज़ से प्यार की बरसात होगी,
और मेरे ही रंग में रंग जाओगी,
जब कभी मेरे लफ्ज़ों को दौहराओगी।

बीते हुए पल घेरकर खड़े हो जाएंगे तुम्हें,
हर भूली बिसरी याद तुम्हें हकीकत सी नज़र आएगी,
आंखों में बे-वजह पानी उतर आएगा,
और झपकोगी पलकें तो लहरें छूट जाएंगी,
जब कभी मेरे लफ्ज़ों को दौहराओगी।

यूं तो दिल को अपने पत्थर सा बनाती हो,
करती हो प्यार पर जाने क्यों छुपाती हो,
रखती हो मशरूफ खुदको दुनिया की भीड़ में,
पर अकेले जो बैठती हो तो मेरे ही गीत गाती हो,
जब कभी मेरे लफ्ज़ों को दौहराओगी।

एक चिटका सा था रिशता बचा अपने दरमियां,
चल दी तो तोड़कर उसके सभी निशां,
जब करता हूं याद तुझे, तू आती है सामने,
और जब भी लिखता हूं तुझे,
बढ़ जाता इश्क मेरा।

Tuesday, August 4, 2009

दम तोड़ते लफ्ज़..

लफ्ज़ों के जिस्म से आज रूह निकल गई,
तू जो गई इसको भी संघ ले गई,
अटकी सी हिचकियों में ये तुझसे कह रहे,
कि तेरे ना होने से एहसास मर गए।

आज ये लफ्ज़ कुछ कम पड़ गए।

यही लफ्ज़ कभी बच्चों सा खिलखिलाते थे,
गांव की पगडंडियों को शहर तक ले आते थे,
अकसर करके याद घर को,
कागज़ पे घर बनाते थे।

मगर आज ये लफ्ज़ कुछ कम पड़ गए।

कभी इन्ही लफ्ज़ों में मेरा महबूब रहता था,
नज़्म बनती थी जो दिदार होता था,
शरमाके झुका लेता था महबूब आंखें,
इस कदर इन लफ्ज़ों का बयां होता था।

मगर आज ये लफ्ज़ कुछ कम पड़ गए।

कभी लिखकर के माज़ी को मुझे रुलाया था इन्होने,
कभी आंचल में दिलबर के ये अकसर जागा करते थे,
एक टक चांद को निहार कर ये कभी,
कगज़ पर उसी चांद को ले आया करते थे।

मगर आज ये लफ्ज़ कुछ कम पड़ गए।

थामकर हांथ मैं इनका,रात काट देता था,
चांद अकसर मुझे इस बात पर डांट देता था,
पर आज इनकों क्या हुआ मेरे खुदा,
देखो चल दिए करके ये मुझसे अलविदा।
और बस आज ये लफ्ज़ कुछ कम पड़ गए।

Saturday, August 1, 2009

नादान कोशिश..!

आज खुद अपना लिखा मिटा रहा हूं,
कुछ पाया था खुदा से जिसे आज गवा रहा हूं,
एक फरीशता था आसमां का उतरा जो ज़मी पे,
आज उसके सारे ग़म भुला रहा हूं,
आज खुद अपना लिखा मिटा रहा हूं।

कभी चाहा था जिसे टूटकर,
पन्नों पर उतारा था प्यार जिसका,
उन पन्नों को पानी में बहा रहा हूं,
आज खुद अपना लिखा मिटा रहा हूं।

वो बैठा है चिपककर मेरी रूह से,
लफ्ज़ों में उसका ही दर्द आता है,
झटककर किया था अलग उसको,
पर फिर भी दूर नहीं जाता है,
आज खुद अपना लिखा मिटा रहा हूं।

बस अब यही सेचकर हंस देता हूं,
कि बस लिखा होता तो मिटा भी देता,
पानी में बहा देता,शोलों में जला देता,
पर ज़हन में पैबस्त है वो,
सना है रूह में जो,
उसी पर लिखा मिटा रहा हूं,
आज खुद अपना लिखा मिटा रहा हूं।