Saturday, August 15, 2009

मेरा चांद

छत पर एक रात मैं...
चांद को एक टक निहार रहा था,
शायद तेरा ही चैहरा तलाश रहा था,
बीच में टूटे बादल उसे छुपाते दिखते थे,
जैसे तूने शरमां के परदा किया हो..
तुमने बताया था कि तुमहें कोई यूं देखे..
तो तुम बहुत शरमाते हो..
यही सोच शायद आज जी भर के तुम्हे शरमाते देखा।
छत पर एक रात मैं...

उस रात तूने सितारों की ओढ़नी ओढ़ी थी,
पूरा आकाश तेरा दामन सा नज़र आता था,
रात भर चांदनी का जाम लिए मैं बैठा रहा,
नशा बढ़ता रहा और मैं चांद को तकता रहा।
छत पर एक रात मैं...


अब रोज़ चांद को यूं ही निहारता हूं...
कि कभी तो तुम भी यूं उस चांद को निहारते होगे,
करके याद मुझे तुम भी कभी छत पे तो आते होगे।

क्या हुआ जो हम मिल ना सके...
आदत ही सही पर उमर गुज़र जाएगी।

2 comments:

हरकीरत ' हीर' said...

उस रात तूने सितारों की ओढ़नी ओढ़ी थी,
पूरा आकाश तेरा दामन सा नज़र आता था,
रात भर चांदनी का जाम लिए मैं बैठा रहा,
नशा बढ़ता रहा और मैं चांद को तकता रहा।
छत पर एक रात मैं...

शुरुआत तो अच्छी है ....भावों को खूब ढाला है आपने .....रंग लाओगे .......!!

Unknown said...

nic yr really romantic i liked it:-)