लफ्ज़ों के जिस्म से आज रूह निकल गई,तू जो गई इसको भी संघ ले गई,
अटकी सी हिचकियों में ये तुझसे कह रहे,
कि तेरे ना होने से एहसास मर गए।
आज ये लफ्ज़ कुछ कम पड़ गए।
यही लफ्ज़ कभी बच्चों सा खिलखिलाते थे,
गांव की पगडंडियों को शहर तक ले आते थे,
अकसर करके याद घर को,
कागज़ पे घर बनाते थे।
मगर आज ये लफ्ज़ कुछ कम पड़ गए।
कभी इन्ही लफ्ज़ों में मेरा महबूब रहता था,
नज़्म बनती थी जो दिदार होता था,
शरमाके झुका लेता था महबूब आंखें,
इस कदर इन लफ्ज़ों का बयां होता था।
मगर आज ये लफ्ज़ कुछ कम पड़ गए।
कभी लिखकर के माज़ी को मुझे रुलाया था इन्होने,
कभी आंचल में दिलबर के ये अकसर जागा करते थे,
एक टक चांद को निहार कर ये कभी,
कगज़ पर उसी चांद को ले आया करते थे।
मगर आज ये लफ्ज़ कुछ कम पड़ गए।
थामकर हांथ मैं इनका,रात काट देता था,
चांद अकसर मुझे इस बात पर डांट देता था,
पर आज इनकों क्या हुआ मेरे खुदा,
देखो चल दिए करके ये मुझसे अलविदा।
और बस आज ये लफ्ज़ कुछ कम पड़ गए।

1 comment:
bahut hi khub ......
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