Monday, June 29, 2009

डायरी...

ज़िन्दगी की किताब के कुछ फटे पन्ने,
कुछ धुंधले लफ्ज़ों में लिखी शायरी,
और चंद तुकड़े मिले उसके दिए गुलाब के,
जो आज अचानक मेरी पुरानी डायरी मिल गयी।

वक्त की धूल जम गई थी उसपर,जैसे बंद मकान का हशर होता है।
झाड़कर संभालते हुए पोछा था मैंने उसे,
मानो किसी बच्चे का माथा पोछ रहा हूं।
एक डर था उसे खोलने का कि मुझसे जाने कितनी नाराज़ होगी,
छूट्ते ही कहेगी कि,किसकी सज़ा किसको दे दी तुमने,
तभी देर तक घूरता रहा था उसे।
जो आज अचानक मेरी पुरानी डायरी मिल गयी।

वैसे कभी वो हरपल मेरे साथ होती थी,
लफ्ज़ों के जाने कितने घरौंदे बनाए थे उसमें,
और आज उसे अपने वारिस की तलाश है।

उसके पहले पन्ने पर मेरा नाम लिखा था,
अक्शर बूढ़े हो चुके थे तो अपनी चमक भी खो बैठे थे।
दूसरे पन्ने पर लिखी नज़्म का नज़ारा दिल खुश कर गया,
वहीं अगले पन्ने ने ज़ख्मों पर नाखू़न लगा दिए।
ज़हन के घावों से ख़ून सा रिस गया।
झट से करके बंद उसको फेक दिया था मैने,
और दूर खड़ा कोसता रहा खुदको,
जो आज अचानक मेरी पुरानी डायरी मिल गयी।

Thursday, June 25, 2009

वजह नहीं मिली..




आज बहुत रोने का दिल किया,
कोई वजह नहीं थी,तो रो नहीं सका।
आंसू भी अजीब होतें हैं,
आंखों की सरहद को लांगा नहीं करते।
पर थोड़ा रो लेता तो दिल हल्का हो जाता।
ग़मों के सागर से एक चुल्लू निकल जाता,
बे-वजह उदासी को एक वजह मिल जाती,
और मेरी ज़िन्दगी फिर ढर्रे पे आती।
बस थोड़ा रो लेता तो दिल हल्का हो जाता।

वैसे ग़मों की कमी नहीं मुझे,पर आंसूओं का आकाल सा पड़ा है,
पूरा आसमान है सर पर मगर रोने की जगह नहीं मिलती,
बस इतने ग़म हैं कि किसपर रोंऊ,ये गुत्थी है जो नहीं सुलझती।
बस थोड़ा रो लेता तो दिल हल्का हो जाता।

अब अपने ग़मों को लफ्ज़ों में पिरोने लगा हूं,
सोचता हूं ग़मों को शक्ल मिल सकेगी,
जब पलटूंगा इन्हे किताबों में,तब शायद रोने की वजह मिलेगी।
बस थोड़ा रो लेता तो दिल हल्का हो जाता।

Monday, June 22, 2009

बे-दर..



अपने शहर से कर दिया बेगाना मुझे,
रखता हूं कदम जब अपनी ज़मी पर तब लगती है अंजानी मुझे।
और दिखाता है सूरत तेरी वो हर नुक्कड़ जो जुड़ा था तेरी याद से।

घबराता हूं सोचकर कि तू अब उन दरीचों में नज़र ना आएगी,
जहां कभी निहारा था तुझे,
अब तो अपने शहर का मौसम भी लगता है बेगाना मुझे,
कर गई तू गैर मेरा शहर मुझसे।

तेरी यादों की ओस आज भी जमती हैं इन पलकों पे,
आज भी तेरी बातों की खनक कानों में बजा करती है,
देख कर दुनिया जब देखता हूं तुझे,
तो तुझे देखना ही बेहतर था,लगता है मुझे।

बना के घर तेरा लफ्ज़ों से, रखता हूं किताबों में,
और आती है हंसी जब सोचता हूं तेरा बचपना,
जी लेता हूं अपनी ज़िन्दगी इन्ही यादों के साए में,
और करता हूं प्यार तुझसे आज भी मैं बे-पनाह।

कि मेरे शहर से कर गई तू बेगाना मुझे।
कि मेरे शहर से कर गई तू बेगाना मुझे।

Friday, June 19, 2009

सफर अंजान..




सफर अंजान..
कि चल पड़ा हूं फिर उसी मुकाम पे,
डाल के धूल अपने ग़मों के मकान पे,
और करके अलविदा अपने ज़ख्मों के निशान से,
कि चल पड़ा हूं फिर उसी मुकाम पे।

सोचता हूं किस तरफ रुख करूं,
जबकि हवाएं भी दुशमनी निभातीं हैं,
सोचता हूं किसे बेवफा कहूं,
जबकि मौत भी नज़रें चुराती है।
कि चल पड़ा हूं फिर उसी मुकाम पे,

जब वक्त से जीत न सका तो कह दिया खुदा उसको,
और जब प्यार पे प्यार न मिला तो कह दिया बेवफा उसको,
छुड़ा के रिशतों का दामन ना जाने किस भीड़ में गुम हो जाता हूं,
कि चल पड़ा हूं फिर उसी मुकाम पे,

अपने माज़ी को लिफाफे में बंद रखता हूं,
और अपने कमरे के आइने से डरा करता हूं,
बस दूसरों के ज़ख्मों से मरहम लेता हूं,
कि चल पड़ा हूं फिर उसी मुकाम पे, कि चल पड़ा हूं फिर उसी मुकाम पे।


Tuesday, June 16, 2009






मैं कोई लेखक नहीं...मगर मैने ज़िदगी को जिन आखों से देखा है उन आंखों ने मुझे वो दिखाया जिसे मैंने अपने लफ्ज़ों में समेटने की कोशिश करी है।मेरी ये रचनाएं उन पलों में लिखी गईं हैं जब मैं एक संवेदनशील इंसान से ज़्यादा कुछ नहीं था।

तू आए तो सुकून आए दिल को,
आदत तेरी है वादे तोड़ने की,
तोड़ के दिलों को बस मुह मोड़ने की,
पर हम भी शीशे का जिगर रखतें हैं,
हो जांए चूर फिर भी चुभने का हुनर रखतें हैं,
कि अब तू आए तो सुकून आए दिल को।

तुझे देखने की हसरत पाले बैठा हूं,
अब तेरे दर पे नज़रें टिकाए बैठा हूं,
वक्त का गुलाम सही पर दूंगा मात इस कमज़र्फ को,
कि मौत के आने पर भी उससे दामन बचाए बैठा हूं,
तुझे देखने की हसरत पाले बैठा हूं।

खुद सवाल भी मैं ही हूं और जवाब भी मैं ही होता हूं,
तुझे खुदा सा पूजता हूं और लोबान भी मैं ही होता हूं,
लेता हूं नाम तेरा जब भी महफिल में,
क्या कहूं बदनाम भी मैं ही होता हूं।

उनकों याद रहे कि हम हैं,
जब वो नींद से जागें तो याद आएं उन्हें,
और वो जब छज्जे से झांकें को कहीं दिख जाएं उन्हें,
बस उन्हें याद रहे कि हम हैं।

वो जब अपनी ज़ुबान से मेरा नाम लेतें हैं,
मानों सूखी ज़मी पे बारिश सी होती है,
महक उठता है समा उससे,
और मेरी खुशी अंकुर का रूप लेती है।


तेरी झुकी नज़रें आज भी याद आतीं हैं,
वो जब भी तेरा आना और आकर शरमाना,
तेरा कांपती आवाज़ में मेरा नाम पुकारना,
फिर घबरा के मेरे पहलु में बैठ जाना,
वो बातों में प्यार वो उन आंखों में इकरार,
तेरी झुकी नज़रें आज भी याद आतीं हैं,
तेरे आते ही बदल जाता था समा सारा,
तेरे मुसकुराते ही रौशनी का वो नज़ारा,
तेरा वो आंचल को संभालना,तेरा वो दांतों में उन्गलियों को दबाना।
ना भूला हूं..ना भूल सकता हूं,
तेरा बस मुझे आंखों से छु जाना।
डर के दरवाज़ों को देखतीं उन आंखों में दिखता था डर,
कि तुझे है फिर वापस जाना,
कि तेरी झुकी नज़रें आज भी याद आतीं हैं।

आप मेरे होते तो क्या होता,
मेरा दिल झूम के गाता,
और हर झोंका तेरा ही पैगाम लाता,
मेरा सूरज तुझसे उठता,
और ये चांद तेरे तकिये पर सोता,
आप मेरे होते तो ये होता, आप मेरे होते तो ये होता।

वो जब भी मेरे पहलु में बैठतें हैं,
मुझे उनके नूर का अहसास होता है।
रौशन होता है शजर उनसे,
और उनका एक लफ्ज़ भी मानों अज़ान होता है।

मेरे लफ्ज़ों के दायरे बहुत सीमित हैं,
ये तेरी ख़बियों की उड़ान क्या पकड़ पाएंगे।
हम तो दूर से देखते हैं इस चांद को,
मेरे हाथ कहां इसे छु पाएंगे।

तुझमें एक अलग सी बात लगती है,
तेरी आंखों की चमक झील का चिराग लगती है।
तू दुनिया की सबसे हसीन तो नहीं,
फिर भी तेरी सुरत मुझे महताब लगती है।
तुझमें एक अलग सी बात लगती है।

खुदा कहता है कि वो बेरहम नहीं,
कोई फिर बता दे कि वक्त के ज़ुल्म क्या हैं।

रात तंग करने लगी है मुझको,
नींदें भी नज़रें चुरातीं हैं,
जबकि दिवारें दिलातीं हैं एहसास तनहाई का,
और बस तुम ही तुम याद आते हो।

की तू क्या जाने कि तू क्या है,
चांद को दे दी है मात तूने,
सितारे तुझे लोरियां सुनाते हैं,
आसमां बन जाता है पलंग तेरा,
और तेरी पलकें उठते ही,
सारे परींदे जाग जातें हैं,
की तू क्या जाने कि तू क्या है।

आज भी तेरा जाना मुझे याद सा है,
समा बदला नहीं मगर रौशनी का आकाल सा है,
तुमहारे साथ ही गई मुस्कुराहट अपनी,
बस चेहरा हसता है मगर,
दिल कहीं उदास सा है,
आज भी तेरा जाना मुझे याद सा है।

आज भी तेरे नाम की हिफाज़त किया करता हूं,
आज भी तेरी यादों को हरपल जिया करता हूं,
रखा है संभाल कर तेरे वजूद के इस दिल ने,
तड़पता है ये और मैं तुझे याद किया करता हूं,
आज भी तेरे नाम की हिफाज़त किया करता हूं।

जो कहते थे कि नहीं गुज़रता एक पल भी तेरे बिन,
देखो उन्होने आधी ज़िन्दागी मेरे बगैर ही गुज़ार दी,
दूर जाने पर भीगो देते थे जो आंचल अपना,
आज उन्होने मेरी शख्सियत ही मिटा दी।

आसमां को नींद आए तो उसे सुलाएं कहां,
ज़मी को मौत आए तो उसे दफनाएं कहां,
सागर में लहरें उठे तो उसे छुपाएं तो छुपाएं कहां,
और मुझे तेरी याद आए तो हम जायें तो जायें कहां।


अब बस तू आये...




अब बस तू आये...तो ये दिल झूम के गाए।
तुमको दिल की बात कही,
अपना हाल-ए-बयां कर दिया।
तुम नज़रों को समझ ना सके
और हमने तुम्हें खुदा कह दिया।
तेरे आने की उम्मीद पर बैठा हूं
की तुम आओ तो मेरी सुबह हो,
ये दिल तेरे आने से जागे और
ये सांसें तेरी घबराहट को भांपे।
पर तुम बैठे हो दूर कहीं,
मेरी यादों से बेफिक्र, जहां ना तो तुम्हे
याद हूं मैं..और ना तो कोई फरियाद हूं मैं।
बस यही सोंचता हूं रह-रह के...
कि कहीं
तुने मुझे भुला ना दिया, जिसको चाहा था कभी टूट कर,
कहीं उसने मुझे मिटा ना दिया।
अब तो यही सोचता हूं मैं,
कि जब भी बारिश आये..
तेरी गीली सी मुस्कुराहट लाए
बैठा हूं तेरी आहट पर
कि बस अब तू आये, कि बस अब तू आये




मेरी तलाश ख़त्म नहीं होती...




मेरी तलाश ख़त्म नहीं होती...
रोज़ तलाशता हूं मैं तुझे हर ज़र्रे में..
कुरेद के लकीरों को अपनी ढ़ूंढ़ता हूं मैं तेरा नाम।
मगर मेरी तलाश है कि ख़त्म नहीं होती।
ज़िदगी की भीड़ में तलाशता हूं तुझे मैं..
पर जब देखता हूं अक्स मेरा तो आती तू नज़र है..
बढ़ा के हांथ जब करता हूं महसूस तुझे ..
तो हस्ता है अक्स मेंरा कि ये मेरा ही वजूद है..
मगर मेरी तलाश है कि ख़त्म नहीं होती।
सूरज की तपिश में देखकर आसमां को
करता हूं फरियाद यही की तेरा पता क्या है..
खुदा गर बेरहम नहीं तो मेरी फिर खता क्या है..
बस भटके मुसाफिर सा फिरता हूं यहां वहां ..
मगर मेरी तलाश है कि ख़त्म नहीं होती।
भीड़ में जिंदगी की मिलते हैं कई चहरे
मगर तेरा चेहरा अबतक ना बना सका मैं
कहतें है कलाकार को आंखों की जरूरत नहीं होती
पर अपनी कला में तुझे समा ना सका मैं
मगर मेरी तलाश है कि ख़त्म नहीं होती।
अपने लफज़ों के दायरे में समेटता हूं तेरी खूबियां
कि मुझसे तो मेरी तकदीर नहीं बनती
आब में क्या कहूं कि मेरी ये तलाश ख़त्म नहीं होती।