
मेरी तलाश ख़त्म नहीं होती...
रोज़ तलाशता हूं मैं तुझे हर ज़र्रे में..
कुरेद के लकीरों को अपनी ढ़ूंढ़ता हूं मैं तेरा नाम।
मगर मेरी तलाश है कि ख़त्म नहीं होती।
ज़िदगी की भीड़ में तलाशता हूं तुझे मैं..
पर जब देखता हूं अक्स मेरा तो आती तू नज़र है..
बढ़ा के हांथ जब करता हूं महसूस तुझे ..
तो हस्ता है अक्स मेंरा कि ये मेरा ही वजूद है..
मगर मेरी तलाश है कि ख़त्म नहीं होती।
सूरज की तपिश में देखकर आसमां को
करता हूं फरियाद यही की तेरा पता क्या है..
खुदा गर बेरहम नहीं तो मेरी फिर खता क्या है..
बस भटके मुसाफिर सा फिरता हूं यहां वहां ..
मगर मेरी तलाश है कि ख़त्म नहीं होती।
भीड़ में जिंदगी की मिलते हैं कई चहरे
मगर तेरा चेहरा अबतक ना बना सका मैं
कहतें है कलाकार को आंखों की जरूरत नहीं होती
पर अपनी कला में तुझे समा ना सका मैं
मगर मेरी तलाश है कि ख़त्म नहीं होती।
अपने लफज़ों के दायरे में समेटता हूं तेरी खूबियां
कि मुझसे तो मेरी तकदीर नहीं बनती
आब में क्या कहूं कि मेरी ये तलाश ख़त्म नहीं होती।

2 comments:
talash manzil ki hai toh khatm kaise ho sakti hai..............
talash jaari rahe...........
achhi kavita !
मानव सचमुच है तभी हो विवेक एहसास।
खतम न होने दें कभी जारी रहे तलाश।।
सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com
shyamalsuman@gmail.com
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