Friday, June 19, 2009

सफर अंजान..




सफर अंजान..
कि चल पड़ा हूं फिर उसी मुकाम पे,
डाल के धूल अपने ग़मों के मकान पे,
और करके अलविदा अपने ज़ख्मों के निशान से,
कि चल पड़ा हूं फिर उसी मुकाम पे।

सोचता हूं किस तरफ रुख करूं,
जबकि हवाएं भी दुशमनी निभातीं हैं,
सोचता हूं किसे बेवफा कहूं,
जबकि मौत भी नज़रें चुराती है।
कि चल पड़ा हूं फिर उसी मुकाम पे,

जब वक्त से जीत न सका तो कह दिया खुदा उसको,
और जब प्यार पे प्यार न मिला तो कह दिया बेवफा उसको,
छुड़ा के रिशतों का दामन ना जाने किस भीड़ में गुम हो जाता हूं,
कि चल पड़ा हूं फिर उसी मुकाम पे,

अपने माज़ी को लिफाफे में बंद रखता हूं,
और अपने कमरे के आइने से डरा करता हूं,
बस दूसरों के ज़ख्मों से मरहम लेता हूं,
कि चल पड़ा हूं फिर उसी मुकाम पे, कि चल पड़ा हूं फिर उसी मुकाम पे।


6 comments:

Anonymous said...

जब वक्त से जीत न सका तो कह दिया खुदा उसको,
और जब प्यार पे प्यार न मिला तो कह दिया बेवफा उसको,
Nice. True lines.

श्यामल सुमन said...

जायें किसी मुकाम पे करते रहें प्रयास।
मिले सफलता एक दिन मन में हो विश्वास।।

नोट- वर्ड वेरीफिकेशन हँटा लें।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com
shyamalsuman@gmail.com

ओम आर्य said...

ye safar anjaanaa nahi hai parantu suhaana ho gaya hai .........kyoki wishwaas ke satha aap gamo ko dhuaa me udate aage badh rahe ho.....
thats the way.......thanks alot

परमजीत सिहँ बाली said...

अपने मनोभावों को बहुत सुन्दर शब्द दिए हैं।बधाई।

think wat u thaught said...

hansi khwaab liye jo makaam dhundhoge,manjilen roz nayi raah tujhe dikhayengi.

मधुकर राजपूत said...

मक़तब ए इश्क़ का निराला है ऊसूल, उसको छुट्टी न मिली जिसने ये सबक़ याद किया।