Saturday, August 1, 2009

नादान कोशिश..!

आज खुद अपना लिखा मिटा रहा हूं,
कुछ पाया था खुदा से जिसे आज गवा रहा हूं,
एक फरीशता था आसमां का उतरा जो ज़मी पे,
आज उसके सारे ग़म भुला रहा हूं,
आज खुद अपना लिखा मिटा रहा हूं।

कभी चाहा था जिसे टूटकर,
पन्नों पर उतारा था प्यार जिसका,
उन पन्नों को पानी में बहा रहा हूं,
आज खुद अपना लिखा मिटा रहा हूं।

वो बैठा है चिपककर मेरी रूह से,
लफ्ज़ों में उसका ही दर्द आता है,
झटककर किया था अलग उसको,
पर फिर भी दूर नहीं जाता है,
आज खुद अपना लिखा मिटा रहा हूं।

बस अब यही सेचकर हंस देता हूं,
कि बस लिखा होता तो मिटा भी देता,
पानी में बहा देता,शोलों में जला देता,
पर ज़हन में पैबस्त है वो,
सना है रूह में जो,
उसी पर लिखा मिटा रहा हूं,
आज खुद अपना लिखा मिटा रहा हूं।

5 comments:

Vinay said...

बहुत बेहतरीन रचना प्रस्तुत की है
---------
· चाँद, बादल और शाम

दिगम्बर नासवा said...

लाजवाब रचना है........... बहुत कुछ कहती हुयी........

परमजीत सिहँ बाली said...

बहुत बढिया रचना है बधाई स्वीकारें।

मधुकर राजपूत said...

लो जी बधाईयों में एक बधाई हमारी भी और रोते को हंसाने के लिए कह देते हैं कि नटराज पेंसिल इस्तेमाल किया होती और अब रबड़ यानी इरेज़र ले बैठते तो मिटाने में आसानी होती। लगे रहो। घिसते रहो आत्मा को शायद कुछ मिट ही जाए। हाहाहाहा

ABHINAV said...

good really very good. keep it up