Saturday, August 8, 2009

लफ्ज़ों में रहता हूं..

जब कभी मेरे लफ्ज़ों को दौहराओगी,
मुझे अपने सामने खड़ा पाओगी,
हर एक लफ्ज़ से प्यार की बरसात होगी,
और मेरे ही रंग में रंग जाओगी,
जब कभी मेरे लफ्ज़ों को दौहराओगी।

बीते हुए पल घेरकर खड़े हो जाएंगे तुम्हें,
हर भूली बिसरी याद तुम्हें हकीकत सी नज़र आएगी,
आंखों में बे-वजह पानी उतर आएगा,
और झपकोगी पलकें तो लहरें छूट जाएंगी,
जब कभी मेरे लफ्ज़ों को दौहराओगी।

यूं तो दिल को अपने पत्थर सा बनाती हो,
करती हो प्यार पर जाने क्यों छुपाती हो,
रखती हो मशरूफ खुदको दुनिया की भीड़ में,
पर अकेले जो बैठती हो तो मेरे ही गीत गाती हो,
जब कभी मेरे लफ्ज़ों को दौहराओगी।

एक चिटका सा था रिशता बचा अपने दरमियां,
चल दी तो तोड़कर उसके सभी निशां,
जब करता हूं याद तुझे, तू आती है सामने,
और जब भी लिखता हूं तुझे,
बढ़ जाता इश्क मेरा।

2 comments:

अनिल कान्त said...

मुझे तो मोहब्बत नज़र आती है इस रचना में

Anonymous said...

जब भी लिखता हूं तुझे,
बढ़ जाता इश्क मेरा।
likhana bhi usake karan hai hai...aur likh kar pyar ka badhana bhi usake karan hi hai...
rishta chahe chitaka rahe...
usame pyar bhi usake karan hi hai..