आज नए रास्तों की तलाश में फिर भटक गया,जाने क्या सोचा था,जाने क्या हो गया,
अब सब फैला सा दिखता है मुझे,
कुछ बिखरे से रिशते,
एक टूटा सा लम्हा,
और उसके कहे आखिरी लफ्ज़,
इन्हें हर कोने में तलाशता हूं,
और रखा कहां अकसर भूल जाता हूं,
आज नए रास्तों की तलाश में फिर भटक गया।
रोज़ एक नए सवाल में उलझता जाता हूं,
ज़िन्दगी एक पहेली है अब समझ में आता है,
एक टक देखकर लकीरों को अपनी,
उन्हें बदल देने को जी चाहता है,
वैसे खुदा की रहमतों से तो ताल्लुक ना हुआ,
और उसने जो दर्द दिया हमने उसे ही खुदा जाना,
आज नए रास्तों की तलाश में फिर भटक गया।
अब बस ज़िन्दा हूं तो जिए जाता हूं,
वक्त से कुछ मिला होता तो हंसके जी पाता,
लोग जीने की फरीयाद किया करतें हैं,
और मैं मरने की आरज़ू भी कर नहीं पाता।
अब बस इतना बता दे कोई...कि
खुदा गर बेरहम नहीं,
तो फिर वक्त के ज़ुल्म क्या हैं।

3 comments:
Saurabh,
ur writing skill is good. whenever I read ur poems... No,they are not poems... always ur "Love Pain"... I feel some “ Gravitational Attraction”.
when ur in love u can write very well, but when that pain grows up that time u write Best... I am right... hai na...
per dard ko apane par havi mat hone dena... usase nikalane ki koshsh karo... nahi to jeena mushkil ho jayega....
खोज करे जो नयी राह की करता वही कमाल।
ये भी सच कि जीवन खुद में उलझा एक सवाल।।
उम्दा रचना!
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