Monday, June 22, 2009

बे-दर..



अपने शहर से कर दिया बेगाना मुझे,
रखता हूं कदम जब अपनी ज़मी पर तब लगती है अंजानी मुझे।
और दिखाता है सूरत तेरी वो हर नुक्कड़ जो जुड़ा था तेरी याद से।

घबराता हूं सोचकर कि तू अब उन दरीचों में नज़र ना आएगी,
जहां कभी निहारा था तुझे,
अब तो अपने शहर का मौसम भी लगता है बेगाना मुझे,
कर गई तू गैर मेरा शहर मुझसे।

तेरी यादों की ओस आज भी जमती हैं इन पलकों पे,
आज भी तेरी बातों की खनक कानों में बजा करती है,
देख कर दुनिया जब देखता हूं तुझे,
तो तुझे देखना ही बेहतर था,लगता है मुझे।

बना के घर तेरा लफ्ज़ों से, रखता हूं किताबों में,
और आती है हंसी जब सोचता हूं तेरा बचपना,
जी लेता हूं अपनी ज़िन्दगी इन्ही यादों के साए में,
और करता हूं प्यार तुझसे आज भी मैं बे-पनाह।

कि मेरे शहर से कर गई तू बेगाना मुझे।
कि मेरे शहर से कर गई तू बेगाना मुझे।

2 comments:

अजय कुमार झा said...

बहुत खूब ...बड़े सुन्दर भाव रचे हैं...लिखते रहे...

कुलदीप मिश्र said...

bahut khoob mitra..