Friday, July 31, 2009

वक्त…

वक्त क्या है..?
कोई अंजान मुसाफिर जिसको मिलता नहीं मुकाम,
या कोई बे-दर्द सुलतान जिसके लाखों हैं फरमान।

वक्त क्या है..?
बे-हिसाब यादों की टोकरी,
या ख़त्म ना होते सपनों की दुकान।

वक्त क्या है..?
बस एक बे-वफा सनम,
या उसकी आख़री झलक का अरमान।

वक्त क्या है..?
एक पत्थर,एक सच या नसीबों की पेहचान।

वक्त क्या है..?
खुदा का दर,
या मंदिर की घंटीयों में लाखों दुआएं।

वक्त क्या है..?
तेरा मेरा कल,
या गुज़रे हुए माज़ी की चिताएं।

वक्त क्या है..?
ग़रीब की रोटी,
या महलों में बजती शहनाई।

वक्त क्या है..?
किसी के लिए बुरा,
तो किसी पर बे-हिसाब मेहरबान।

ये वक्त ना तेरा है... ना मेरा है,
जिसका हुआ उसके लिए सवेरा है,
और जिससे हुआ ख़फा तो एक घंघोर अंधेरा है।

Thursday, July 30, 2009

भूख…

जलन होती है..रहा नहीं जाता,
भट्टी सी खौलती है ये पेट की अग्नि,
सिहर उठता है रोम रोम मेरा,
जब दुनिया को भरे पेट देखता हूं,
तब भूख की तपिश तोड़ती है हौसले मेरे,
तब ग़म से मेरी आंखें सुर्ख लाल होतीं हैं।

देखा है अमीरों को बे-फिक्र दुनिया से,
जाने कितने निवाले यूं ही फेक देतें हैं,
लगती है भूख जब मुझे तो सब्र ना होता,
और लगता है कि कोई एक निवाला फेंक दे मुझपर।

ज़लालत सी लगती है मुझे ज़िन्दगी अपनी,
पर जानता हूं ऊसूलों से कभी पेट ना भरते,
लाख करता हूं जतन हिम्मत जुटाने की,
पर पेट की अग्नि जलाकर भस्म करती है।

खुदा को कोसकर दिलको तसल्ली दे तो देता हूं,
पर उसी खुदा से एक निवाले की मैं फरीयाद करता हूं,
और नसीब चीखता है मेरा,
के की है दुरगत मेरी तूने,
जब मैं पागलों सा दो रोटी चुरा के खाता हूं।

Monday, July 27, 2009

भईया भये एनआरआई...

विलायत में रहतें हैं पर विलायती बहु नहीं चाहिए,
बेटा रोज़ रात को बाप के साथ पीता है,
पर बहु का घूंघट ज़रा ऊपर ना हो जाए।
इंडिया से आए थे इंगलिश बोल ना पाते,
और आज फोन पर इंगलिश खूब झाड़ते।

इंडिया जब भी आतें हैं,नांक सिकुड़ी सी रहती है,
कभी गलियों में लोटे थे हैं अकसर भूल ये जाते।
पहनकर हैट विदेशी गांव में टहलतें हैं,
जैसे अंग्रेज हैं कोई आजादी से भी पहले के।

पुत्तन नाम था इनका,अम्मा जब बुलाती थी,
“पैटी” बन गए देखो विलायत जाके ये साहब,
विलायत में रहतें हैं पर विलायती बहु नहीं चाहिए।

बेटे की करी शादी,पूरे रस्मों-रिवाज से,
के खुद जाकर विलायत ये कभी एक मेम फांसे थे,
और जो पाए थे ग्रीन कार्ड तो विदेशी कहलाए थे।

पुत्तन का परीवार भी कम मॉड नहीं है,
बिटीया है जो डैडी को स्वीटहार्ट कहती है,
पहनती है ये कम कपड़े ये तो आम बात है,
कि अब यारों की लिस्ट डैडी को अकसर दिखाती है।

‘पैटी’ भी रोतें हैं आंचल में अम्मा के,
जो कभी साल दो साल में अपने गांव जातें हैं।
के विलायत में रहतें हैं पर विलायती बहु नहीं चाहिए।

Thursday, July 23, 2009

यादों की बारिश..

तेरी यादों की बारिश थमने का नाम नहीं लेती,
सर से पांव तक सराबोर हूं तेरी याद में,
लफ्ज़ ख़त्म हैं जो उन्हें कह पाऊं किसी से,
अब तू ही कोई इलाज आकर बता दे।

जो तू आया तो नजरों को पानी मिलेगा,
मेरी यादों में तेरी तसवीर भी दिखेगी,
अपने ख्वाबों की ताबीर सामने देखूंगा,
जब तुम मुसकुरा के मेरा हाल पूछोगे।

सहेजी हुई बातों को कह पाऊंगा तुमसे,
सामने जो बैठोगी तो जी भर के देखूंगा,
बतलाऊंगा की आती हो कितना याद तुम,
और जब शरमाओगी तो हाथों से मूह छुपाओगी।

जब भी लिखता हूं तेरी याद लफ्ज़ों में,
तेरे जिस्म की परछाई को मेरे पास पाता हूं,
मेरी रूह डूब जाती है तेरी यादों के पानी में,
और नज़्म बनती है जैसे सीप में मोती।

Wednesday, July 22, 2009

सीखा बहुत कुछ...

दो पल को जो तू आया मुझे जीना सिखा गया,
जब से जन्मा था ना मिला था तुझसा कोई,
तू जो मिला था तो मुझे हंसना सिखा गया।

मुहब्बत की गलियों से गुज़रता था मैं बच के,
तू मुझे इंतेहा की मुहब्बत सिखा गया।

बोलता था पर लफ्ज़ों में वज़न कहां था,
तू मेरे लफ्ज़ों को भारी बना गया।

ग़म तो लाख थे मगर आंसू कहां बहते,
तू जो मुड़ा तो मुझे रोना था आ गया।

लोग कहते थे बेवफा है तू ज़ालिम,
सारी दुनिया को वफा करना सिखा गया।
दो पल को जो तू आया मुझे जीना सिखा गया।

नसीब खोटा था मेरा,जो तू ना मिल सका,
पर वीरान सी दुनिया मेरी जन्नत बना गया।

लकीर कुरेदता रहा पर तेरा नाम ना मिला,
और खुदा भी कह रहा कि मेरी है ये ख़ता,
देखा तुझे दूर तक जाते हुए दिलबर,
सांसे तो चल रहीं मेरी मगर ज़िन्दा मैं ना बचा,
दो पल को जो तू आया मुझे जीना सिखा गया।

जब मांगता हूं दुआ तो होती है तेरे लिए,
खुदा भी कहता है कि मैं अब ख़ुदगर्ज़ ना रहा,
दो पल को जो तू आया मुझे जीना सिखा गया।

Monday, July 13, 2009

देवी..

मैं क्या ग़लत करती हूं..
बिलखते हैं बच्चे मेरे जब भूख से,
तब मैं अपना जिस्म बेच दिया करती हूं,
दो वक्त की रोटी के लिए इज़्ज़त का व्यापार किया करती हूं,
मैं भी समाज का एक हिस्सा हूं,
पर हर नुक्कड पर बिक जाती हूं,
लोग कहते हैं वैश्या मुझे,
पर मैं क्या गलत करती हूं।

शरीफों की बस्ती से नहीं वास्ता मुझे,
अपने छज्जे से इन्हें देखा करती हूं,
देखा है लोगों को निकलते इस गली से,
अपनी नाक सीकोड़ लिया करते हैं,
गंदी नाली सी समझते हैं ज़िन्दगी मेरी,
फिर भी अपनी भूख मिटा लिया करतें हैं,
दिखती हूं औरत सा पर कभी औरत नहीं कहलाती हूं,
लोग कहते हैं वैश्या मुझे,
पर मैं क्या गलत करतीं हूं।

समाज नहीं अपनाता मुझे,
कहता है मैं एक गाली हूं,
दुनिया की गंदगी समेटती हूं आंचल में,
और सब कहतें हैं मैं एक धंधेवाली हूं,
क्या ग़लत करती हूं मैं।

रिश्ता नहीं जोड़ता कोई,
सब नोचते हैं गिद्धों सा,
मैं भी हो गई आदी हूं,
नहीं होती अब जज़्बाती हूं,
लोग कहते हैं वैश्या मुझे,
पर मैं क्या गलत करतीं हूं।

Thursday, July 9, 2009

उलझन में हूं..

उलझन में हूं कि तुझे क्या कहूं ?
तुझे बेमिसाल कहूं,
खुदा का कमाल कहूं,
या शायर का ख़्याल कहूं,
उलझन में हूं कि तुझे क्या कहूं ?

फूल कहूं,
कली कहूं,
या बाघबान का दुलार कहूं,
उलझन में हूं....

नज़्म कहूं,
ग़ज़ल कहूं,
या गीतों की बहार कहूं,
उलझन में हूं ....

मंदिर कहूं,
मसजिद कहूं,
या पीरों की मज़ार कहूं,
उलझन में हूं ....

इश्क कहूं,
मुहब्बत कहूं,
या दिल में पनपता प्यार कहूं,
उलझन में हूं ....

सुबाह कहूं,
शाम कहूं,
या रातों में निकलता चांद कहूं,
उलझन में हूं ....

दिल कहूं,
दिलदार कहूं,
या ख़त्म ना होता इंतज़ार कहूं,
उलझन में हूं ....

रिशता कहूं,
बंधन कहूं,
या जन्मों के तालूकात कहूं,
उलझन में हूं ....

करता हूं तुझसे प्यार कहूं,
इतना कि बे-शुमार कहूं,
कि अब मैं उलझन में हूं कि तुझको क्या कहूं।

Wednesday, July 8, 2009

सब तेरा...

मेरा कुछ भी मेरा ना रहा..
आंखों की बात करूं तो करतीं हैं जि़द बच्चों सा,
ना खुद थकतीं हैं और ना मुझे सोने देतीं हैं।
तकतीं हैं छत की दिवारों को जैसे,
पथरा गईं हों किसी मुकाम पर जाके।

जो दिल की बात करूं तो कम नहीं करता परेशान मुझे,
हरपल बस तुझे ही सोचता है,
ना खुद जीता है और ना मुझे जीने देता है।
भरता है आंहे लेकर के नाम तेरा,
और जब देखो चलने की रफ्तार बदल देता है।
कि अब मेरा कुछ भी मेरा ना रहा।

उघर दिल की शरारत ख़त्म होती है,
तो दिमाग भी तेरा ही गु़लाम है,
लोग समझते हैं शातिर इसको,
पर कहता है कि किया मुझे बस बदनाम है,
देता साथ ये दिल का ही है,
बस करता है याद तुझे ये बराबर से।
कि अब मेरा कुछ भी मेरा ना रहा।

वहीं होंठ कैसे रह जाते पीछे,
कि अब बहानों से तेरा नाम लिया करतें हैं,
बनाके नज़्म तेरे प्यार को,जाने कितने शेर कहा करतें हैं।
कि अब मेरा कुछ भी मेरा ना रहा।

अब क्या कहूं की सर से पांव तक हो चुका हूं मूरीद तेरा,
कि बस एक इशारा ही दे दो तो लगे यही हाल है तेरा,
कि अब मेरा कुछ भी मेरा ना रहा।

Tuesday, July 7, 2009

परी..

ज़िन्दगी की राहों में था मशरूफ यूं हीं,
तभी किसी आहट ने खीचा था ध्यान अपनी ओर,
करके बातें चंद कर गई वो यूं मदहोश,
जैसे शायर लिखता है नज़्म देखकर चांद की ओर।

ना कोई शक्ल थी ना आवाज़ उसकी,
बस एक एहसास था जो हरपल दिलाता एक विशवास था,
कि जो भी है ये है सादगी से सराबोर।
ज़िन्दगी की राहों में था मशरूफ यूं हीं।

ऐसा नहीं था कि चेहरों की कमी थी,
हज़ारों मंडराते थे चेहरे चारों ओर,
पर बुनते थे ख़्याल बस उसका ही चेहरा,
क्योंकि उसका नहीं था कोई भी मोल,
ज़िन्दगी की राहों में था मशरूफ यूं हीं।

आज लिखकर उसे किताबों में बना दिया है घर उसका,
संजोया है प्यार से हर दिवारो दर उसका,
बस अब देखना है कि वक्त के कोड़ों का कैसे चलता है ज़ोर।
ज़िन्दगी की राहों में था मशरूफ यूं हीं।

अंजान बनते हो...

तुम अलग हो सबसे ये जान गया था मैं,
पर तुम्हें भी है जाना ये दिल मान नहीं पा रहा।

तुम सोचते हो मुझको ये जान गया था मैं,
पर नहीं समझोगे मुझको ये दिल मान नहीं पा रहा।

तुम लाखों में एक हो ये जान गया था मैं,
पर इंतने ना-समझ होगे ये दिल मान नहीं पा रहा।

तुम सब जानकर हो अंजान ये जान गया था मैं,
पर तुम यूं छुड़ाओगे दामन ये दिल मान नहीं पा रहा।

मेरी उदासी का सबब पूछोगे ये जान गया था मैं,
पर वजह नहीं मालूम तुमको ये दिल मान नहीं पा रहा।

Saturday, July 4, 2009

आन्या...

दिल पर दस्तक हुई,
खोला तो देखा एक परी नज़रें झुकाए खड़ी है।
खूबसूरती क्या बयान करूं,इतनी कि शब्दों में ना कैद हो पाएगी,
मासूम सी आंखों में प्यार भरा था,
होंठों पर कोई बात आकर डर गई थी,
बस हांथों में एक चीज़ थी जिसे पहचान गया था मैं।
किसी दिन आंखें बंद करे एक फूल मांगा था मैने,
क्या पता था खुदा ऐसे भिजवाएगा।
एक बैगनी फूल था उसके हाथ में..
मुझे बचपन से ही पसंद है,
पर देर तक सोचता रहा कि फूल को देखूं या उसको।
जब उसने नज़रें उठाईं तो सारे ग़म भुला दिये थे मैने,
लगा खुदा खुद दरवाज़े पर अपने किये कि माफी मांगता है,
कहता है कि तेरी तकदीर के ग़मों का मैं ज़िम्मेदार सही,
पर ये फूल तेरे ज़्खमों पे मरहम रखेगा।