Tuesday, July 7, 2009

अंजान बनते हो...

तुम अलग हो सबसे ये जान गया था मैं,
पर तुम्हें भी है जाना ये दिल मान नहीं पा रहा।

तुम सोचते हो मुझको ये जान गया था मैं,
पर नहीं समझोगे मुझको ये दिल मान नहीं पा रहा।

तुम लाखों में एक हो ये जान गया था मैं,
पर इंतने ना-समझ होगे ये दिल मान नहीं पा रहा।

तुम सब जानकर हो अंजान ये जान गया था मैं,
पर तुम यूं छुड़ाओगे दामन ये दिल मान नहीं पा रहा।

मेरी उदासी का सबब पूछोगे ये जान गया था मैं,
पर वजह नहीं मालूम तुमको ये दिल मान नहीं पा रहा।

3 comments:

श्यामल सुमन said...

मानेगा न दिल कभी दिल की उल्टी बात।
अक्स उलट जाये जहाँ यही प्रेम सौगात।।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com
shyamalsuman@gmail.com

ओम आर्य said...

तुम सब जानकर हो अंजान ये जान गया था मैं,
पर तुम यूं छुड़ाओगे दामन ये दिल मान नहीं पा रहा।

बहुत ही सुन्दर लगी ये पंक्तियाँ

M VERMA said...

पंक्तिया बहुत सुन्दर है. चित्र तो लाजवाब