ज़िन्दगी की राहों में था मशरूफ यूं हीं,तभी किसी आहट ने खीचा था ध्यान अपनी ओर,
करके बातें चंद कर गई वो यूं मदहोश,
जैसे शायर लिखता है नज़्म देखकर चांद की ओर।
ना कोई शक्ल थी ना आवाज़ उसकी,
बस एक एहसास था जो हरपल दिलाता एक विशवास था,
कि जो भी है ये है सादगी से सराबोर।
ज़िन्दगी की राहों में था मशरूफ यूं हीं।
ऐसा नहीं था कि चेहरों की कमी थी,
हज़ारों मंडराते थे चेहरे चारों ओर,
पर बुनते थे ख़्याल बस उसका ही चेहरा,
क्योंकि उसका नहीं था कोई भी मोल,
ज़िन्दगी की राहों में था मशरूफ यूं हीं।
आज लिखकर उसे किताबों में बना दिया है घर उसका,
संजोया है प्यार से हर दिवारो दर उसका,
बस अब देखना है कि वक्त के कोड़ों का कैसे चलता है ज़ोर।
ज़िन्दगी की राहों में था मशरूफ यूं हीं।

5 comments:
बहुत ही सुन्दर यह तो परी है ही
बेहतरीन!!
लगे रहो, प्यार में किसे छुट्टी मिलती है। अहसास होते हैं और खाली हाथों के साथ भरा हुआ दिलो दिमाग। बस एक ही फायदा है कि खाली दिमाग शैतान का घर बनने से बच जाता है आशिक।
आज लिखकर उसे किताबों में बना दिया है घर उसका,
संजोया है प्यार से हर दिवारो दर उसका,
behatareen == bahut sunder abhivyakti
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