Tuesday, July 7, 2009

परी..

ज़िन्दगी की राहों में था मशरूफ यूं हीं,
तभी किसी आहट ने खीचा था ध्यान अपनी ओर,
करके बातें चंद कर गई वो यूं मदहोश,
जैसे शायर लिखता है नज़्म देखकर चांद की ओर।

ना कोई शक्ल थी ना आवाज़ उसकी,
बस एक एहसास था जो हरपल दिलाता एक विशवास था,
कि जो भी है ये है सादगी से सराबोर।
ज़िन्दगी की राहों में था मशरूफ यूं हीं।

ऐसा नहीं था कि चेहरों की कमी थी,
हज़ारों मंडराते थे चेहरे चारों ओर,
पर बुनते थे ख़्याल बस उसका ही चेहरा,
क्योंकि उसका नहीं था कोई भी मोल,
ज़िन्दगी की राहों में था मशरूफ यूं हीं।

आज लिखकर उसे किताबों में बना दिया है घर उसका,
संजोया है प्यार से हर दिवारो दर उसका,
बस अब देखना है कि वक्त के कोड़ों का कैसे चलता है ज़ोर।
ज़िन्दगी की राहों में था मशरूफ यूं हीं।

5 comments:

ओम आर्य said...

बहुत ही सुन्दर यह तो परी है ही

Udan Tashtari said...

बेहतरीन!!

मधुकर राजपूत said...

लगे रहो, प्यार में किसे छुट्टी मिलती है। अहसास होते हैं और खाली हाथों के साथ भरा हुआ दिलो दिमाग। बस एक ही फायदा है कि खाली दिमाग शैतान का घर बनने से बच जाता है आशिक।

M VERMA said...

आज लिखकर उसे किताबों में बना दिया है घर उसका,
संजोया है प्यार से हर दिवारो दर उसका,
behatareen == bahut sunder abhivyakti

Unknown said...
This comment has been removed by the author.