दो पल को जो तू आया मुझे जीना सिखा गया,जब से जन्मा था ना मिला था तुझसा कोई,
तू जो मिला था तो मुझे हंसना सिखा गया।
मुहब्बत की गलियों से गुज़रता था मैं बच के,
तू मुझे इंतेहा की मुहब्बत सिखा गया।
बोलता था पर लफ्ज़ों में वज़न कहां था,
तू मेरे लफ्ज़ों को भारी बना गया।
ग़म तो लाख थे मगर आंसू कहां बहते,
तू जो मुड़ा तो मुझे रोना था आ गया।
लोग कहते थे बेवफा है तू ज़ालिम,
सारी दुनिया को वफा करना सिखा गया।
दो पल को जो तू आया मुझे जीना सिखा गया।
नसीब खोटा था मेरा,जो तू ना मिल सका,
पर वीरान सी दुनिया मेरी जन्नत बना गया।
लकीर कुरेदता रहा पर तेरा नाम ना मिला,
और खुदा भी कह रहा कि मेरी है ये ख़ता,
देखा तुझे दूर तक जाते हुए दिलबर,
सांसे तो चल रहीं मेरी मगर ज़िन्दा मैं ना बचा,
दो पल को जो तू आया मुझे जीना सिखा गया।
जब मांगता हूं दुआ तो होती है तेरे लिए,
खुदा भी कहता है कि मैं अब ख़ुदगर्ज़ ना रहा,
दो पल को जो तू आया मुझे जीना सिखा गया।

5 comments:
सचमुच में बहुत ही प्रभावशाली लेखन है... वाह…!!! वाकई आपने बहुत अच्छा लिखा है। आशा है आपकी कलम इसी तरह चलती रहेगी बधाई स्वीकारें।
आप के द्वारा दी गई प्रतिक्रियाएं मेरा मार्गदर्शन एवं प्रोत्साहन करती हैं।
आप के अमूल्य सुझावों का 'मेरी पत्रिका' में स्वागत है...
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Saurabh,
Too good. Deep & touching to. I always believe that Love ss Beautiful but It's Painful & it's true. You alsow feel this.
Saurabh,
Too good. Deep & touching too. I always believe that Love is Beautiful but It's Painful too & it's true. You also feel this.
शानदार मुझे नहीं पता था सौरभ बाबू आप कविता भी लिखते हैं असल जिंदगी की कविता....
जन्मा था ना मिला था तुझसा कोई,
तू जो मिला था तो मुझे हंसना सिखा गया।
मुहब्बत की गलियों से गुज़रता था मैं बच के,
तू मुझे इंतेहा की मुहब्बत सिखा गया।
बहुत सुन्दर रचना ....मन के भावों की सुन्दर अभिव्यक्ति ....!
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