Saturday, July 4, 2009

आन्या...

दिल पर दस्तक हुई,
खोला तो देखा एक परी नज़रें झुकाए खड़ी है।
खूबसूरती क्या बयान करूं,इतनी कि शब्दों में ना कैद हो पाएगी,
मासूम सी आंखों में प्यार भरा था,
होंठों पर कोई बात आकर डर गई थी,
बस हांथों में एक चीज़ थी जिसे पहचान गया था मैं।
किसी दिन आंखें बंद करे एक फूल मांगा था मैने,
क्या पता था खुदा ऐसे भिजवाएगा।
एक बैगनी फूल था उसके हाथ में..
मुझे बचपन से ही पसंद है,
पर देर तक सोचता रहा कि फूल को देखूं या उसको।
जब उसने नज़रें उठाईं तो सारे ग़म भुला दिये थे मैने,
लगा खुदा खुद दरवाज़े पर अपने किये कि माफी मांगता है,
कहता है कि तेरी तकदीर के ग़मों का मैं ज़िम्मेदार सही,
पर ये फूल तेरे ज़्खमों पे मरहम रखेगा।

2 comments:

ओम आर्य said...

पर ये फूल तेरे ज़्खमों पे मरहम रखेगा।
bahut khub par majburi bhi koee chij hoti hai.......

Sajal Ehsaas said...

feelings achhi hai...cheezein visualise ho rahi thi...bahut khoob


www.pyasasajal.blogspot.com