Wednesday, July 8, 2009

सब तेरा...

मेरा कुछ भी मेरा ना रहा..
आंखों की बात करूं तो करतीं हैं जि़द बच्चों सा,
ना खुद थकतीं हैं और ना मुझे सोने देतीं हैं।
तकतीं हैं छत की दिवारों को जैसे,
पथरा गईं हों किसी मुकाम पर जाके।

जो दिल की बात करूं तो कम नहीं करता परेशान मुझे,
हरपल बस तुझे ही सोचता है,
ना खुद जीता है और ना मुझे जीने देता है।
भरता है आंहे लेकर के नाम तेरा,
और जब देखो चलने की रफ्तार बदल देता है।
कि अब मेरा कुछ भी मेरा ना रहा।

उघर दिल की शरारत ख़त्म होती है,
तो दिमाग भी तेरा ही गु़लाम है,
लोग समझते हैं शातिर इसको,
पर कहता है कि किया मुझे बस बदनाम है,
देता साथ ये दिल का ही है,
बस करता है याद तुझे ये बराबर से।
कि अब मेरा कुछ भी मेरा ना रहा।

वहीं होंठ कैसे रह जाते पीछे,
कि अब बहानों से तेरा नाम लिया करतें हैं,
बनाके नज़्म तेरे प्यार को,जाने कितने शेर कहा करतें हैं।
कि अब मेरा कुछ भी मेरा ना रहा।

अब क्या कहूं की सर से पांव तक हो चुका हूं मूरीद तेरा,
कि बस एक इशारा ही दे दो तो लगे यही हाल है तेरा,
कि अब मेरा कुछ भी मेरा ना रहा।

3 comments:

ओम आर्य said...

bahut hi pyara khonaa hai .........atisundar

Vinay said...

बहुत सुन्दरता है

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नये प्रकार के ब्लैक होल की खोज संभावित

M VERMA said...

कि अब मेरा कुछ भी मेरा ना रहा।
बहुत खूब सुन्दर रचना