मैं क्या ग़लत करती हूं..बिलखते हैं बच्चे मेरे जब भूख से,
तब मैं अपना जिस्म बेच दिया करती हूं,
दो वक्त की रोटी के लिए इज़्ज़त का व्यापार किया करती हूं,
मैं भी समाज का एक हिस्सा हूं,
पर हर नुक्कड पर बिक जाती हूं,
लोग कहते हैं वैश्या मुझे,
पर मैं क्या गलत करती हूं।
शरीफों की बस्ती से नहीं वास्ता मुझे,
अपने छज्जे से इन्हें देखा करती हूं,
देखा है लोगों को निकलते इस गली से,
अपनी नाक सीकोड़ लिया करते हैं,
गंदी नाली सी समझते हैं ज़िन्दगी मेरी,
फिर भी अपनी भूख मिटा लिया करतें हैं,
दिखती हूं औरत सा पर कभी औरत नहीं कहलाती हूं,
लोग कहते हैं वैश्या मुझे,
पर मैं क्या गलत करतीं हूं।
समाज नहीं अपनाता मुझे,
कहता है मैं एक गाली हूं,
दुनिया की गंदगी समेटती हूं आंचल में,
और सब कहतें हैं मैं एक धंधेवाली हूं,
क्या ग़लत करती हूं मैं।
रिश्ता नहीं जोड़ता कोई,
सब नोचते हैं गिद्धों सा,
मैं भी हो गई आदी हूं,
नहीं होती अब जज़्बाती हूं,
लोग कहते हैं वैश्या मुझे,
पर मैं क्या गलत करतीं हूं।

7 comments:
abhut hi bhavuk kar dene ali rachana .
bas yahi kahani hai ek beshyaa ke ....unake jindagi ki kahani ko our unke marm ko bahut hi beharin dang se prastut kiya hai.........umda
बेहतरीन रचना
बधाई
उनके दर्द को सही शब्दों में सहेजा है.
सही शब्दों में सही रचना, बधाई.
लगता है हाल ही में दौरा करके आए हो।
हाहाहाहा
mere daman me phool hain ki kanten,tumhe kaise dikhaun...kya sochta hu tere baare m, kaise tumhe bataun..har mod pe karta hun wahi kaam .phir tumhe kyun samjhau...dear nice but yaar ise samjha kaise ja sakta hai...phir samjhana bhi galat hi hoga...aise hi likhte raho...
regards
Dilip Mishra
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