विलायत में रहतें हैं पर विलायती बहु नहीं चाहिए,बेटा रोज़ रात को बाप के साथ पीता है,
पर बहु का घूंघट ज़रा ऊपर ना हो जाए।
इंडिया से आए थे इंगलिश बोल ना पाते,
और आज फोन पर इंगलिश खूब झाड़ते।
इंडिया जब भी आतें हैं,नांक सिकुड़ी सी रहती है,
कभी गलियों में लोटे थे हैं अकसर भूल ये जाते।
पहनकर हैट विदेशी गांव में टहलतें हैं,
जैसे अंग्रेज हैं कोई आजादी से भी पहले के।
पुत्तन नाम था इनका,अम्मा जब बुलाती थी,
“पैटी” बन गए देखो विलायत जाके ये साहब,
विलायत में रहतें हैं पर विलायती बहु नहीं चाहिए।
बेटे की करी शादी,पूरे रस्मों-रिवाज से,
के खुद जाकर विलायत ये कभी एक मेम फांसे थे,
और जो पाए थे ग्रीन कार्ड तो विदेशी कहलाए थे।
पुत्तन का परीवार भी कम मॉड नहीं है,
बिटीया है जो डैडी को स्वीटहार्ट कहती है,
पहनती है ये कम कपड़े ये तो आम बात है,
कि अब यारों की लिस्ट डैडी को अकसर दिखाती है।
‘पैटी’ भी रोतें हैं आंचल में अम्मा के,
जो कभी साल दो साल में अपने गांव जातें हैं।
के विलायत में रहतें हैं पर विलायती बहु नहीं चाहिए।

4 comments:
अच्छा लिखा है आपने ..
मेरी कलम - मेरी अभिव्यक्ति
पैंटी रहे कहीं भी..है तो हिन्दुस्तानी ही न भाई.
ye to desi dil ke sath vilayati pahchaan banane ki ek koshish bhar hai....shayad ye gana kaafi satik hoga...."ki dil ko dekho...chehra na dekho...."
क्यों अंगारे उगल रहे हो यार। कोई फुंक न जाए। सही कहा नितेश जी ने। भाई कलेवर मत देखो दिल देखो। कुछ जवान जो विदेश गए थे, बुड्ढे हो गए लेकिन देश में आकर शायद अब नाक भौं नहीं सिकोड़ते, कहते हैं कि पहले से बेहतर हो रहा है।
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