Thursday, July 30, 2009

भूख…

जलन होती है..रहा नहीं जाता,
भट्टी सी खौलती है ये पेट की अग्नि,
सिहर उठता है रोम रोम मेरा,
जब दुनिया को भरे पेट देखता हूं,
तब भूख की तपिश तोड़ती है हौसले मेरे,
तब ग़म से मेरी आंखें सुर्ख लाल होतीं हैं।

देखा है अमीरों को बे-फिक्र दुनिया से,
जाने कितने निवाले यूं ही फेक देतें हैं,
लगती है भूख जब मुझे तो सब्र ना होता,
और लगता है कि कोई एक निवाला फेंक दे मुझपर।

ज़लालत सी लगती है मुझे ज़िन्दगी अपनी,
पर जानता हूं ऊसूलों से कभी पेट ना भरते,
लाख करता हूं जतन हिम्मत जुटाने की,
पर पेट की अग्नि जलाकर भस्म करती है।

खुदा को कोसकर दिलको तसल्ली दे तो देता हूं,
पर उसी खुदा से एक निवाले की मैं फरीयाद करता हूं,
और नसीब चीखता है मेरा,
के की है दुरगत मेरी तूने,
जब मैं पागलों सा दो रोटी चुरा के खाता हूं।

2 comments:

ओम आर्य said...

behad samwedanshil rachana

M VERMA said...

देखा है अमीरों को बे-फिक्र दुनिया से,
जाने कितने निवाले यूं ही फेक देतें हैं,
बहुत मार्मिक और संवेदनशील रचना
बहुत खूब