Friday, July 31, 2009

वक्त…

वक्त क्या है..?
कोई अंजान मुसाफिर जिसको मिलता नहीं मुकाम,
या कोई बे-दर्द सुलतान जिसके लाखों हैं फरमान।

वक्त क्या है..?
बे-हिसाब यादों की टोकरी,
या ख़त्म ना होते सपनों की दुकान।

वक्त क्या है..?
बस एक बे-वफा सनम,
या उसकी आख़री झलक का अरमान।

वक्त क्या है..?
एक पत्थर,एक सच या नसीबों की पेहचान।

वक्त क्या है..?
खुदा का दर,
या मंदिर की घंटीयों में लाखों दुआएं।

वक्त क्या है..?
तेरा मेरा कल,
या गुज़रे हुए माज़ी की चिताएं।

वक्त क्या है..?
ग़रीब की रोटी,
या महलों में बजती शहनाई।

वक्त क्या है..?
किसी के लिए बुरा,
तो किसी पर बे-हिसाब मेहरबान।

ये वक्त ना तेरा है... ना मेरा है,
जिसका हुआ उसके लिए सवेरा है,
और जिससे हुआ ख़फा तो एक घंघोर अंधेरा है।

1 comment:

मधुकर राजपूत said...

तो बेहतर ही बेहतर करो क्योंकि हम चाहें न चाहें वक्त गुज़र जाता है। अच्छी रचना है मज़ा आया पढ़कर। भावपूर्ण, चिंतनपूर्ण।