Sunday, December 20, 2009

खनक..

आवाज़ लाख़ सुनी मैंने..पर तेरी आवाज़ की खनक का.. क्या कहना
कानों से उतरी जो दिल में उस दर्दे-जिगर का..क्या कहना
शबनम से पाक तेरे बोल..ख़ुदा की उस आमद का..क्या कहना

अपने नाम को मुकम्मल सा पाता हूं,
जो तेरी ज़ुबान से सुन फिर जी जाता हूं,
कि अब उस अंदाजे़ बयान का..क्या कहना।

तू ख़ुदा तो नहीं कहीं इन्सान के लिबास में..
कि तेरी नूरे नज़र का..क्या कहना..
अब तो लिखतें हैं गज़लें शायर तेरे हुस्ने-शबाब पे..
कि कागज़ पे उतरा जो तू तो ..क्या कहना।

कभी करो ज़िक्र महफिल में तो तारीफों के पुलिंदे,
अब तो शहर हुआ ग़ुलाम तेरा कि.. क्या कहना।
आज देखा था चांद छुप रहा था बादल में,
कि तू आया था छत पे कि क्या कहना।

शरमाती सी आंखें जो मिल जाएं किसी से,
करदें यूं मुरीद कि क्या कहना।
कि तुझे करूं तो करूं बयान किन लफ्ज़ों में,
कि बस तेरा नाम ही बहुत है..कि अब क्या कहना।

Sunday, December 13, 2009

वो किसी और का है..

आज एक इंतज़ार ख़त्म हो गया,
उसके आने का.....
एक उम्मीद थी जो टूट के गिर पड़ी,
उसने हस्ते हस्ते जो अलविदा कह दिया।

मैंने कितने सपने यूं ही सजाए थे..
एक नकली सी दुनिया बसाई थी..
करके इंतज़ार हर रात उसको,
हर राह पे शमा जलाई थी।

अचानक से आज वो टकरा गई थी,
लगा दुनिया में मेरी फिर वो गई थी,
मगर उसकी बातों में नाम कोई और ही था,
जिसे बता के मुझे वो शरमा रही थी।

आज एक इंतज़ार खत्म हो गया..
उसके आने का।

Friday, November 27, 2009

ज़हन के ज़ख्म...

आंखें भरीं हैं..पर लब मुस्कुरातें हैं,
हाथों में थामें शमा..हम अमन चाहतें हैं,
चंद लोगों ने क्या खीचीं लकीरें ज़मी पर,
हम अभी तक उस की कीमत चुकातें हैं।

आंखें भरीं हैं..पर लब मुस्कुरातें हैं,

आतंक ही आतंक फैला है.. इस कदर,
कि बारिश में भी लाल छीटें आतें हैं,
लाल हो चला है आसमान सारा,
और लोग ख़ून के धब्बों पे पोछे लगातें हैं

आंखें भरीं हैं..पर लब मुस्कुरातें हैं,

ये कैसी प्यास है जो लोगों के ख़ून से बुझती है,
चंद लोग इसे ख़ुदा का काम बतातें हैं,
वो कौन सी किताब है जो ख़ून में सनी हो,
जबकि कुराने शरिफ के फलसफे वो भुलातें हैं

आंखें भरीं हैं..पर लब मुस्कुरातें हैं,

बस आयो सब भूलकर हम गले मिल जाएं,
जैसे दो बिछड़े भाई गले लग मुस्कुराते हैं।
आंखें भरीं हैं..पर लब मुस्कुरातें हैं।

Wednesday, October 28, 2009

काश वो होती..तो देखती मैं बदल गया हूं

आज कहने को बहुत कुछ है पर कोई सुनने वाला नहीं,
कल सुनने वाला था तो कहा नहीं जाता था,
इस कहने और सुनने के बीच...कुछ था,
तो वो प्यार था..और वो भी बेशुमार था।
जो आज भी है...
कुछ नहीं है....
तो वो नहीं है.....

आज भी यादों की पोटली सर पे लिए फिरता हूं मैं,
घर जो लौटता हूं..तो उसका इंतजार याद आ जाता है,
घंटों इंतजार करती वो आंखें..जो देखते ही मुझे खिल जाया करती थीं,
मेरे आते ही उसका शिकायत करना,
मेरा हमेशा की तरह सुन के अनसुना कर देना,
वो कहते कहते चुप हो जाया करती थी,
मेरे एक जवाब के लिए खुद को तरसाया करती थी,
पर जाने मैं किस धुन में रहता था,
ज़िन्दगी की उधेड़-बुन रहता था।

बहुत कुछ पा सकता था पर खोता चला गया,
चंद रुपयों के लिए रोता चला गया,
सोचा था पैसों से मुहब्बत और रंग लाती है,
क्या पता था..पैसों से दूरियां और बढ़ जाती हैं।

कल वो थी तो पैसे नहीं हुआ करते थे,
आज पैसे हैं..तो वो नहीं है...
इस पाने और खोने के बीच...
अगर कुछ है...तो आज भी प्यार है...
और वो भी बेशुमार है।

खुदा गुनाहों की सज़ा कुछ इस कदर देता है,
कि सबकुछ देकर के तुझे...तेरा सबकुछ ले लेता है।

Friday, October 23, 2009

कमरा..

मैं सोचता हूं अपना कमरा बदल लूं..
शाम होते ही दीवारें चीखने लगतीं हैं,
उसके आने की राह तकता दिखता है दरवाज़ा मेरा,
खिड़कियों से झांकती दिखतीं हैं खुशबू उसी की,
और आईना अक्स मेरा ही छुपा देता है,
कि कहीं चेहरे पर आज भी वही प्यार ना दिख जाए।
अब मैं सोचता हूं अपना कमरा बदल लूं..

रातों को दबे पांव वो जाने कैसे आता है,
जबकि सिटकनी हाथों से खुद लगाके सोता हूं,
वैसे नींद का आना भी जैसे करामात है,
वो भी तभी आती है जब वो ख्वाबों में आता है,
अब सोचता हूं अपना कमरा बदल लूं..

मशरूफ रहकर सुबह तो अपनी काट देता हूं,
पर शाम होते ही फिर उसी तनहाई का डर साथ होता है,
पैर उठते हैं..रुकतें हैं..उसी कमरे पे जाने से,
कभी ज़िन्दगी की जहां हमने हसीन शाम देखी थी,
वो जो आया था तो ऐसा जादू लाया था,
कि मेरी हर चीज़ को मेरी तरह दिवाना कर गया,
अब सोचता हूं अपना कमरा बदल ही लूं..

Thursday, October 22, 2009

मुझे फर्क नहीं पड़ता...

उसके होने या ना होने से मुझे फर्क नहीं पड़ता,
दिल तड़पता है पर एक आंसू नहीं टपकता,
मगर उसके होने या ना होने से मुझे फर्क नहीं पड़ता।

बिन बुलाए वो आया था,
और बिन बताए वो चला गया,
उसका हर समान पड़ा है मेरे दिल के खा़ने में,
और रखा है हिफाज़त से तकीये के सिरहाने में,
मगर उसके होने या ना होने से मुझे फर्क नहीं पड़ता।

वो गया तो यूं गया..
कि सुबाह आम हो गई,
शामें जाने कब ढ़ली..जाने कब रात हो गई,
कहीं भी दिल नहीं लगता..कोई बता दे फिर रस्ता।
मगर उसके होने या ना होने से मुझे फर्क नहीं पड़ता।

नाम किसी का भी मैं लूं,
याद उसी की आती है,
प्यार उसी से करता हूं,
मेरी धड़कन बताती है,
वजह लिखने की खो बैठा,
कलम पकड़ा नहीं जाता,
और एक भी अकशर काग़ज़ पे उतर नहीं पाता।
मगर उसके होने या ना होने से मुझे फर्क नहीं पड़ता।

कलम फिर जो थामा है,
वजह लिखने की फिर वो है,
कि उसको याद करना बन चुकी आदत है अब मेरी।
और अब नहीं बोलूंगा कभी..कि..
उसके होने या ना होने से मुझे फर्क नहीं पड़ता।

Sunday, September 6, 2009

तेरे इश्क में..

रोज़ की ठोकर से संभलने की अदा सीख गया हूं,
अब तो गुरबत में भी जीने की अदा सीख गया हूं,
मुसीबत रोज़ नए लिबास बदल आ जाती है,
अब मैं भी बहरूपिये सा हुनर सीख गया हूं।

आदत पड़ चुकी है दर्द को सह जाने की,
ज़ख्म नासूर से रहकर भी मुस्कुराते हैं,
मैं रोज़ फैली सी ज़िन्दगी को समेट लेता हूं,
मगर कुछ फलसफे हैं जो,फिर भी बीखर जातें हैं।

हर शक्स मुझे नए सबक दे जाता है,
दर्द देता है तो मरहम भी दे जाता है,
मैं अकसर वक्त को मुजरिम सा खड़ा पाता हूं,
जब मैं पीठ पर ख़न्जर सा भुंका पाता हूं।

बस एक उम्मीद है बाकी अब तेरे आने की,
तेरी चाहत है वजह मेरे पास जिये जाने की,
तेरी शक्ल आज भी नहीं बन पाती मुझसे,
बस तेरा नाम ही मुकम्मल है उमर गुज़ारने के लिए।

Sunday, August 30, 2009

इज़हार..

जाने क्या अब होने को है,
दिल उदास है तो रोने को है,
उसकी एक झलक की ख़तिर
सारी दुनिया खंगोलने को है..
जाने क्या अब होने को है।

रोज़ की आदतों में शुमार है वो भी,
करता है प्यार पर छुपाता है वो भी,
हमेशा करके बाते इधर-उधर की,
बातों में अपनी उलझाता है वो भी।
जाने क्या अब होने को है।

अकसर लोग प्यार किया करतें हैं,
छुपातें है उन्ही से जिनसे बे-शुमार किया करतें हैं,
लूंगा सबक अब दुनिया से मैं भी,
और कह दूंगा की हां मुझे प्यार है तुमसे।

Saturday, August 29, 2009

क्या होगा तेरे इंतज़ार में ?

क्या होगा तेरे इंतज़ार में ?
उनका ज़िक्र मेरी बातों में मिल जाएगा,
उनका नाम अनायास ही मेरे हाथों से लिख जाएगा,
हूंगा मशरूफ दुनिया की भीड़ में,
पर एक चेहरा उनका भी दिख जाएगा,

यही होगा तेरे इंतज़ार में।

कहते-कहते कभी रुक जाया करूंगा,
दुनिया जो पुछेगी तो बहलाया करूंगा,
अकसर बताकर आंसूओं को पानी,
हंसके उन्हें पी जाया करूंगा,

यही होगा तेरे इंतज़ार में।

सूरज जो डूबेगा तो दिल उदास होगा,
शाम जो होगी तो दर्द पास होगा,
दीवारों को तकेंगी आंखें मेरी,
बस रात भर ख़्यालों में तू साथ होगा,

यही होगा तेरे इंतज़ार में।

कभी तुझे भी तो मैं याद आता हूंगा,
ना चाहतें हुए भी तुझे तड़पाता हूंगा,
बहानों से लेती तो होगी नाम मेरा,
बस ज़िक्र ही सही,
कुछ वक्त तेरे साथ तो बिताता हूंगा।

Wednesday, August 26, 2009

तेरे लिए..

आज नए रास्तों की तलाश में फिर भटक गया,
जाने क्या सोचा था,जाने क्या हो गया,
अब सब फैला सा दिखता है मुझे,
कुछ बिखरे से रिशते,
एक टूटा सा लम्हा,
और उसके कहे आखिरी लफ्ज़,
इन्हें हर कोने में तलाशता हूं,
और रखा कहां अकसर भूल जाता हूं,
आज नए रास्तों की तलाश में फिर भटक गया।


रोज़ एक नए सवाल में उलझता जाता हूं,
ज़िन्दगी एक पहेली है अब समझ में आता है,
एक टक देखकर लकीरों को अपनी,
उन्हें बदल देने को जी चाहता है,
वैसे खुदा की रहमतों से तो ताल्लुक ना हुआ,
और उसने जो दर्द दिया हमने उसे ही खुदा जाना,
आज नए रास्तों की तलाश में फिर भटक गया।

अब बस ज़िन्दा हूं तो जिए जाता हूं,
वक्त से कुछ मिला होता तो हंसके जी पाता,
लोग जीने की फरीयाद किया करतें हैं,
और मैं मरने की आरज़ू भी कर नहीं पाता।

अब बस इतना बता दे कोई...कि
खुदा गर बेरहम नहीं,
तो फिर वक्त के ज़ुल्म क्या हैं।

Saturday, August 15, 2009

मेरा चांद

छत पर एक रात मैं...
चांद को एक टक निहार रहा था,
शायद तेरा ही चैहरा तलाश रहा था,
बीच में टूटे बादल उसे छुपाते दिखते थे,
जैसे तूने शरमां के परदा किया हो..
तुमने बताया था कि तुमहें कोई यूं देखे..
तो तुम बहुत शरमाते हो..
यही सोच शायद आज जी भर के तुम्हे शरमाते देखा।
छत पर एक रात मैं...

उस रात तूने सितारों की ओढ़नी ओढ़ी थी,
पूरा आकाश तेरा दामन सा नज़र आता था,
रात भर चांदनी का जाम लिए मैं बैठा रहा,
नशा बढ़ता रहा और मैं चांद को तकता रहा।
छत पर एक रात मैं...


अब रोज़ चांद को यूं ही निहारता हूं...
कि कभी तो तुम भी यूं उस चांद को निहारते होगे,
करके याद मुझे तुम भी कभी छत पे तो आते होगे।

क्या हुआ जो हम मिल ना सके...
आदत ही सही पर उमर गुज़र जाएगी।

Friday, August 14, 2009

तेरी अमानत..

तुम तो चले जाते हो,
पर अपने पीछे छोड़ जाते हो कुछ कीमती सामान,
अपनी खुशबू जो दिनों तक मेरे कमरे में रह जाती है,
वो सिलवटें जिनमें तेरी करवटें नज़र आतीं हैं,
वो तेरा नूर शजर पे रौशन सा रहता है,
और हर तरफ,
तेरी हंसी की आवाज़ें मंडरातीं है,
तुम तो चले जाते हो...।

मुझे तेरी ज़ुल्फों के निशान लिहाफों में मिल जातें हैं,
चुनकर उनकों हिफाज़त से संजो लेता हूं,
और करके याद गुज़रे लम्हों को,
फिर से उन्ही लम्हों को जी लेता हूं,
तुम तो चले जाते हो...।

कभी एक आंसू गिरा था तेरा,
मैनें अमानत सा रखा है,
उससे कीमती कुछ मेरा कहां है,
जो कभी आओगे वापस तो सब वैसा ही पाओगे,
तेरी हर चीज़ की हिफाज़त मैं करता हूं बरसों से,
बस तुझे लौटा के मैं सब कुछ,
दुनिया से विदा लूंगा।

Saturday, August 8, 2009

लफ्ज़ों में रहता हूं..

जब कभी मेरे लफ्ज़ों को दौहराओगी,
मुझे अपने सामने खड़ा पाओगी,
हर एक लफ्ज़ से प्यार की बरसात होगी,
और मेरे ही रंग में रंग जाओगी,
जब कभी मेरे लफ्ज़ों को दौहराओगी।

बीते हुए पल घेरकर खड़े हो जाएंगे तुम्हें,
हर भूली बिसरी याद तुम्हें हकीकत सी नज़र आएगी,
आंखों में बे-वजह पानी उतर आएगा,
और झपकोगी पलकें तो लहरें छूट जाएंगी,
जब कभी मेरे लफ्ज़ों को दौहराओगी।

यूं तो दिल को अपने पत्थर सा बनाती हो,
करती हो प्यार पर जाने क्यों छुपाती हो,
रखती हो मशरूफ खुदको दुनिया की भीड़ में,
पर अकेले जो बैठती हो तो मेरे ही गीत गाती हो,
जब कभी मेरे लफ्ज़ों को दौहराओगी।

एक चिटका सा था रिशता बचा अपने दरमियां,
चल दी तो तोड़कर उसके सभी निशां,
जब करता हूं याद तुझे, तू आती है सामने,
और जब भी लिखता हूं तुझे,
बढ़ जाता इश्क मेरा।

Tuesday, August 4, 2009

दम तोड़ते लफ्ज़..

लफ्ज़ों के जिस्म से आज रूह निकल गई,
तू जो गई इसको भी संघ ले गई,
अटकी सी हिचकियों में ये तुझसे कह रहे,
कि तेरे ना होने से एहसास मर गए।

आज ये लफ्ज़ कुछ कम पड़ गए।

यही लफ्ज़ कभी बच्चों सा खिलखिलाते थे,
गांव की पगडंडियों को शहर तक ले आते थे,
अकसर करके याद घर को,
कागज़ पे घर बनाते थे।

मगर आज ये लफ्ज़ कुछ कम पड़ गए।

कभी इन्ही लफ्ज़ों में मेरा महबूब रहता था,
नज़्म बनती थी जो दिदार होता था,
शरमाके झुका लेता था महबूब आंखें,
इस कदर इन लफ्ज़ों का बयां होता था।

मगर आज ये लफ्ज़ कुछ कम पड़ गए।

कभी लिखकर के माज़ी को मुझे रुलाया था इन्होने,
कभी आंचल में दिलबर के ये अकसर जागा करते थे,
एक टक चांद को निहार कर ये कभी,
कगज़ पर उसी चांद को ले आया करते थे।

मगर आज ये लफ्ज़ कुछ कम पड़ गए।

थामकर हांथ मैं इनका,रात काट देता था,
चांद अकसर मुझे इस बात पर डांट देता था,
पर आज इनकों क्या हुआ मेरे खुदा,
देखो चल दिए करके ये मुझसे अलविदा।
और बस आज ये लफ्ज़ कुछ कम पड़ गए।

Saturday, August 1, 2009

नादान कोशिश..!

आज खुद अपना लिखा मिटा रहा हूं,
कुछ पाया था खुदा से जिसे आज गवा रहा हूं,
एक फरीशता था आसमां का उतरा जो ज़मी पे,
आज उसके सारे ग़म भुला रहा हूं,
आज खुद अपना लिखा मिटा रहा हूं।

कभी चाहा था जिसे टूटकर,
पन्नों पर उतारा था प्यार जिसका,
उन पन्नों को पानी में बहा रहा हूं,
आज खुद अपना लिखा मिटा रहा हूं।

वो बैठा है चिपककर मेरी रूह से,
लफ्ज़ों में उसका ही दर्द आता है,
झटककर किया था अलग उसको,
पर फिर भी दूर नहीं जाता है,
आज खुद अपना लिखा मिटा रहा हूं।

बस अब यही सेचकर हंस देता हूं,
कि बस लिखा होता तो मिटा भी देता,
पानी में बहा देता,शोलों में जला देता,
पर ज़हन में पैबस्त है वो,
सना है रूह में जो,
उसी पर लिखा मिटा रहा हूं,
आज खुद अपना लिखा मिटा रहा हूं।

Friday, July 31, 2009

वक्त…

वक्त क्या है..?
कोई अंजान मुसाफिर जिसको मिलता नहीं मुकाम,
या कोई बे-दर्द सुलतान जिसके लाखों हैं फरमान।

वक्त क्या है..?
बे-हिसाब यादों की टोकरी,
या ख़त्म ना होते सपनों की दुकान।

वक्त क्या है..?
बस एक बे-वफा सनम,
या उसकी आख़री झलक का अरमान।

वक्त क्या है..?
एक पत्थर,एक सच या नसीबों की पेहचान।

वक्त क्या है..?
खुदा का दर,
या मंदिर की घंटीयों में लाखों दुआएं।

वक्त क्या है..?
तेरा मेरा कल,
या गुज़रे हुए माज़ी की चिताएं।

वक्त क्या है..?
ग़रीब की रोटी,
या महलों में बजती शहनाई।

वक्त क्या है..?
किसी के लिए बुरा,
तो किसी पर बे-हिसाब मेहरबान।

ये वक्त ना तेरा है... ना मेरा है,
जिसका हुआ उसके लिए सवेरा है,
और जिससे हुआ ख़फा तो एक घंघोर अंधेरा है।

Thursday, July 30, 2009

भूख…

जलन होती है..रहा नहीं जाता,
भट्टी सी खौलती है ये पेट की अग्नि,
सिहर उठता है रोम रोम मेरा,
जब दुनिया को भरे पेट देखता हूं,
तब भूख की तपिश तोड़ती है हौसले मेरे,
तब ग़म से मेरी आंखें सुर्ख लाल होतीं हैं।

देखा है अमीरों को बे-फिक्र दुनिया से,
जाने कितने निवाले यूं ही फेक देतें हैं,
लगती है भूख जब मुझे तो सब्र ना होता,
और लगता है कि कोई एक निवाला फेंक दे मुझपर।

ज़लालत सी लगती है मुझे ज़िन्दगी अपनी,
पर जानता हूं ऊसूलों से कभी पेट ना भरते,
लाख करता हूं जतन हिम्मत जुटाने की,
पर पेट की अग्नि जलाकर भस्म करती है।

खुदा को कोसकर दिलको तसल्ली दे तो देता हूं,
पर उसी खुदा से एक निवाले की मैं फरीयाद करता हूं,
और नसीब चीखता है मेरा,
के की है दुरगत मेरी तूने,
जब मैं पागलों सा दो रोटी चुरा के खाता हूं।

Monday, July 27, 2009

भईया भये एनआरआई...

विलायत में रहतें हैं पर विलायती बहु नहीं चाहिए,
बेटा रोज़ रात को बाप के साथ पीता है,
पर बहु का घूंघट ज़रा ऊपर ना हो जाए।
इंडिया से आए थे इंगलिश बोल ना पाते,
और आज फोन पर इंगलिश खूब झाड़ते।

इंडिया जब भी आतें हैं,नांक सिकुड़ी सी रहती है,
कभी गलियों में लोटे थे हैं अकसर भूल ये जाते।
पहनकर हैट विदेशी गांव में टहलतें हैं,
जैसे अंग्रेज हैं कोई आजादी से भी पहले के।

पुत्तन नाम था इनका,अम्मा जब बुलाती थी,
“पैटी” बन गए देखो विलायत जाके ये साहब,
विलायत में रहतें हैं पर विलायती बहु नहीं चाहिए।

बेटे की करी शादी,पूरे रस्मों-रिवाज से,
के खुद जाकर विलायत ये कभी एक मेम फांसे थे,
और जो पाए थे ग्रीन कार्ड तो विदेशी कहलाए थे।

पुत्तन का परीवार भी कम मॉड नहीं है,
बिटीया है जो डैडी को स्वीटहार्ट कहती है,
पहनती है ये कम कपड़े ये तो आम बात है,
कि अब यारों की लिस्ट डैडी को अकसर दिखाती है।

‘पैटी’ भी रोतें हैं आंचल में अम्मा के,
जो कभी साल दो साल में अपने गांव जातें हैं।
के विलायत में रहतें हैं पर विलायती बहु नहीं चाहिए।

Thursday, July 23, 2009

यादों की बारिश..

तेरी यादों की बारिश थमने का नाम नहीं लेती,
सर से पांव तक सराबोर हूं तेरी याद में,
लफ्ज़ ख़त्म हैं जो उन्हें कह पाऊं किसी से,
अब तू ही कोई इलाज आकर बता दे।

जो तू आया तो नजरों को पानी मिलेगा,
मेरी यादों में तेरी तसवीर भी दिखेगी,
अपने ख्वाबों की ताबीर सामने देखूंगा,
जब तुम मुसकुरा के मेरा हाल पूछोगे।

सहेजी हुई बातों को कह पाऊंगा तुमसे,
सामने जो बैठोगी तो जी भर के देखूंगा,
बतलाऊंगा की आती हो कितना याद तुम,
और जब शरमाओगी तो हाथों से मूह छुपाओगी।

जब भी लिखता हूं तेरी याद लफ्ज़ों में,
तेरे जिस्म की परछाई को मेरे पास पाता हूं,
मेरी रूह डूब जाती है तेरी यादों के पानी में,
और नज़्म बनती है जैसे सीप में मोती।

Wednesday, July 22, 2009

सीखा बहुत कुछ...

दो पल को जो तू आया मुझे जीना सिखा गया,
जब से जन्मा था ना मिला था तुझसा कोई,
तू जो मिला था तो मुझे हंसना सिखा गया।

मुहब्बत की गलियों से गुज़रता था मैं बच के,
तू मुझे इंतेहा की मुहब्बत सिखा गया।

बोलता था पर लफ्ज़ों में वज़न कहां था,
तू मेरे लफ्ज़ों को भारी बना गया।

ग़म तो लाख थे मगर आंसू कहां बहते,
तू जो मुड़ा तो मुझे रोना था आ गया।

लोग कहते थे बेवफा है तू ज़ालिम,
सारी दुनिया को वफा करना सिखा गया।
दो पल को जो तू आया मुझे जीना सिखा गया।

नसीब खोटा था मेरा,जो तू ना मिल सका,
पर वीरान सी दुनिया मेरी जन्नत बना गया।

लकीर कुरेदता रहा पर तेरा नाम ना मिला,
और खुदा भी कह रहा कि मेरी है ये ख़ता,
देखा तुझे दूर तक जाते हुए दिलबर,
सांसे तो चल रहीं मेरी मगर ज़िन्दा मैं ना बचा,
दो पल को जो तू आया मुझे जीना सिखा गया।

जब मांगता हूं दुआ तो होती है तेरे लिए,
खुदा भी कहता है कि मैं अब ख़ुदगर्ज़ ना रहा,
दो पल को जो तू आया मुझे जीना सिखा गया।

Monday, July 13, 2009

देवी..

मैं क्या ग़लत करती हूं..
बिलखते हैं बच्चे मेरे जब भूख से,
तब मैं अपना जिस्म बेच दिया करती हूं,
दो वक्त की रोटी के लिए इज़्ज़त का व्यापार किया करती हूं,
मैं भी समाज का एक हिस्सा हूं,
पर हर नुक्कड पर बिक जाती हूं,
लोग कहते हैं वैश्या मुझे,
पर मैं क्या गलत करती हूं।

शरीफों की बस्ती से नहीं वास्ता मुझे,
अपने छज्जे से इन्हें देखा करती हूं,
देखा है लोगों को निकलते इस गली से,
अपनी नाक सीकोड़ लिया करते हैं,
गंदी नाली सी समझते हैं ज़िन्दगी मेरी,
फिर भी अपनी भूख मिटा लिया करतें हैं,
दिखती हूं औरत सा पर कभी औरत नहीं कहलाती हूं,
लोग कहते हैं वैश्या मुझे,
पर मैं क्या गलत करतीं हूं।

समाज नहीं अपनाता मुझे,
कहता है मैं एक गाली हूं,
दुनिया की गंदगी समेटती हूं आंचल में,
और सब कहतें हैं मैं एक धंधेवाली हूं,
क्या ग़लत करती हूं मैं।

रिश्ता नहीं जोड़ता कोई,
सब नोचते हैं गिद्धों सा,
मैं भी हो गई आदी हूं,
नहीं होती अब जज़्बाती हूं,
लोग कहते हैं वैश्या मुझे,
पर मैं क्या गलत करतीं हूं।

Thursday, July 9, 2009

उलझन में हूं..

उलझन में हूं कि तुझे क्या कहूं ?
तुझे बेमिसाल कहूं,
खुदा का कमाल कहूं,
या शायर का ख़्याल कहूं,
उलझन में हूं कि तुझे क्या कहूं ?

फूल कहूं,
कली कहूं,
या बाघबान का दुलार कहूं,
उलझन में हूं....

नज़्म कहूं,
ग़ज़ल कहूं,
या गीतों की बहार कहूं,
उलझन में हूं ....

मंदिर कहूं,
मसजिद कहूं,
या पीरों की मज़ार कहूं,
उलझन में हूं ....

इश्क कहूं,
मुहब्बत कहूं,
या दिल में पनपता प्यार कहूं,
उलझन में हूं ....

सुबाह कहूं,
शाम कहूं,
या रातों में निकलता चांद कहूं,
उलझन में हूं ....

दिल कहूं,
दिलदार कहूं,
या ख़त्म ना होता इंतज़ार कहूं,
उलझन में हूं ....

रिशता कहूं,
बंधन कहूं,
या जन्मों के तालूकात कहूं,
उलझन में हूं ....

करता हूं तुझसे प्यार कहूं,
इतना कि बे-शुमार कहूं,
कि अब मैं उलझन में हूं कि तुझको क्या कहूं।

Wednesday, July 8, 2009

सब तेरा...

मेरा कुछ भी मेरा ना रहा..
आंखों की बात करूं तो करतीं हैं जि़द बच्चों सा,
ना खुद थकतीं हैं और ना मुझे सोने देतीं हैं।
तकतीं हैं छत की दिवारों को जैसे,
पथरा गईं हों किसी मुकाम पर जाके।

जो दिल की बात करूं तो कम नहीं करता परेशान मुझे,
हरपल बस तुझे ही सोचता है,
ना खुद जीता है और ना मुझे जीने देता है।
भरता है आंहे लेकर के नाम तेरा,
और जब देखो चलने की रफ्तार बदल देता है।
कि अब मेरा कुछ भी मेरा ना रहा।

उघर दिल की शरारत ख़त्म होती है,
तो दिमाग भी तेरा ही गु़लाम है,
लोग समझते हैं शातिर इसको,
पर कहता है कि किया मुझे बस बदनाम है,
देता साथ ये दिल का ही है,
बस करता है याद तुझे ये बराबर से।
कि अब मेरा कुछ भी मेरा ना रहा।

वहीं होंठ कैसे रह जाते पीछे,
कि अब बहानों से तेरा नाम लिया करतें हैं,
बनाके नज़्म तेरे प्यार को,जाने कितने शेर कहा करतें हैं।
कि अब मेरा कुछ भी मेरा ना रहा।

अब क्या कहूं की सर से पांव तक हो चुका हूं मूरीद तेरा,
कि बस एक इशारा ही दे दो तो लगे यही हाल है तेरा,
कि अब मेरा कुछ भी मेरा ना रहा।

Tuesday, July 7, 2009

परी..

ज़िन्दगी की राहों में था मशरूफ यूं हीं,
तभी किसी आहट ने खीचा था ध्यान अपनी ओर,
करके बातें चंद कर गई वो यूं मदहोश,
जैसे शायर लिखता है नज़्म देखकर चांद की ओर।

ना कोई शक्ल थी ना आवाज़ उसकी,
बस एक एहसास था जो हरपल दिलाता एक विशवास था,
कि जो भी है ये है सादगी से सराबोर।
ज़िन्दगी की राहों में था मशरूफ यूं हीं।

ऐसा नहीं था कि चेहरों की कमी थी,
हज़ारों मंडराते थे चेहरे चारों ओर,
पर बुनते थे ख़्याल बस उसका ही चेहरा,
क्योंकि उसका नहीं था कोई भी मोल,
ज़िन्दगी की राहों में था मशरूफ यूं हीं।

आज लिखकर उसे किताबों में बना दिया है घर उसका,
संजोया है प्यार से हर दिवारो दर उसका,
बस अब देखना है कि वक्त के कोड़ों का कैसे चलता है ज़ोर।
ज़िन्दगी की राहों में था मशरूफ यूं हीं।

अंजान बनते हो...

तुम अलग हो सबसे ये जान गया था मैं,
पर तुम्हें भी है जाना ये दिल मान नहीं पा रहा।

तुम सोचते हो मुझको ये जान गया था मैं,
पर नहीं समझोगे मुझको ये दिल मान नहीं पा रहा।

तुम लाखों में एक हो ये जान गया था मैं,
पर इंतने ना-समझ होगे ये दिल मान नहीं पा रहा।

तुम सब जानकर हो अंजान ये जान गया था मैं,
पर तुम यूं छुड़ाओगे दामन ये दिल मान नहीं पा रहा।

मेरी उदासी का सबब पूछोगे ये जान गया था मैं,
पर वजह नहीं मालूम तुमको ये दिल मान नहीं पा रहा।

Saturday, July 4, 2009

आन्या...

दिल पर दस्तक हुई,
खोला तो देखा एक परी नज़रें झुकाए खड़ी है।
खूबसूरती क्या बयान करूं,इतनी कि शब्दों में ना कैद हो पाएगी,
मासूम सी आंखों में प्यार भरा था,
होंठों पर कोई बात आकर डर गई थी,
बस हांथों में एक चीज़ थी जिसे पहचान गया था मैं।
किसी दिन आंखें बंद करे एक फूल मांगा था मैने,
क्या पता था खुदा ऐसे भिजवाएगा।
एक बैगनी फूल था उसके हाथ में..
मुझे बचपन से ही पसंद है,
पर देर तक सोचता रहा कि फूल को देखूं या उसको।
जब उसने नज़रें उठाईं तो सारे ग़म भुला दिये थे मैने,
लगा खुदा खुद दरवाज़े पर अपने किये कि माफी मांगता है,
कहता है कि तेरी तकदीर के ग़मों का मैं ज़िम्मेदार सही,
पर ये फूल तेरे ज़्खमों पे मरहम रखेगा।

Monday, June 29, 2009

डायरी...

ज़िन्दगी की किताब के कुछ फटे पन्ने,
कुछ धुंधले लफ्ज़ों में लिखी शायरी,
और चंद तुकड़े मिले उसके दिए गुलाब के,
जो आज अचानक मेरी पुरानी डायरी मिल गयी।

वक्त की धूल जम गई थी उसपर,जैसे बंद मकान का हशर होता है।
झाड़कर संभालते हुए पोछा था मैंने उसे,
मानो किसी बच्चे का माथा पोछ रहा हूं।
एक डर था उसे खोलने का कि मुझसे जाने कितनी नाराज़ होगी,
छूट्ते ही कहेगी कि,किसकी सज़ा किसको दे दी तुमने,
तभी देर तक घूरता रहा था उसे।
जो आज अचानक मेरी पुरानी डायरी मिल गयी।

वैसे कभी वो हरपल मेरे साथ होती थी,
लफ्ज़ों के जाने कितने घरौंदे बनाए थे उसमें,
और आज उसे अपने वारिस की तलाश है।

उसके पहले पन्ने पर मेरा नाम लिखा था,
अक्शर बूढ़े हो चुके थे तो अपनी चमक भी खो बैठे थे।
दूसरे पन्ने पर लिखी नज़्म का नज़ारा दिल खुश कर गया,
वहीं अगले पन्ने ने ज़ख्मों पर नाखू़न लगा दिए।
ज़हन के घावों से ख़ून सा रिस गया।
झट से करके बंद उसको फेक दिया था मैने,
और दूर खड़ा कोसता रहा खुदको,
जो आज अचानक मेरी पुरानी डायरी मिल गयी।

Thursday, June 25, 2009

वजह नहीं मिली..




आज बहुत रोने का दिल किया,
कोई वजह नहीं थी,तो रो नहीं सका।
आंसू भी अजीब होतें हैं,
आंखों की सरहद को लांगा नहीं करते।
पर थोड़ा रो लेता तो दिल हल्का हो जाता।
ग़मों के सागर से एक चुल्लू निकल जाता,
बे-वजह उदासी को एक वजह मिल जाती,
और मेरी ज़िन्दगी फिर ढर्रे पे आती।
बस थोड़ा रो लेता तो दिल हल्का हो जाता।

वैसे ग़मों की कमी नहीं मुझे,पर आंसूओं का आकाल सा पड़ा है,
पूरा आसमान है सर पर मगर रोने की जगह नहीं मिलती,
बस इतने ग़म हैं कि किसपर रोंऊ,ये गुत्थी है जो नहीं सुलझती।
बस थोड़ा रो लेता तो दिल हल्का हो जाता।

अब अपने ग़मों को लफ्ज़ों में पिरोने लगा हूं,
सोचता हूं ग़मों को शक्ल मिल सकेगी,
जब पलटूंगा इन्हे किताबों में,तब शायद रोने की वजह मिलेगी।
बस थोड़ा रो लेता तो दिल हल्का हो जाता।

Monday, June 22, 2009

बे-दर..



अपने शहर से कर दिया बेगाना मुझे,
रखता हूं कदम जब अपनी ज़मी पर तब लगती है अंजानी मुझे।
और दिखाता है सूरत तेरी वो हर नुक्कड़ जो जुड़ा था तेरी याद से।

घबराता हूं सोचकर कि तू अब उन दरीचों में नज़र ना आएगी,
जहां कभी निहारा था तुझे,
अब तो अपने शहर का मौसम भी लगता है बेगाना मुझे,
कर गई तू गैर मेरा शहर मुझसे।

तेरी यादों की ओस आज भी जमती हैं इन पलकों पे,
आज भी तेरी बातों की खनक कानों में बजा करती है,
देख कर दुनिया जब देखता हूं तुझे,
तो तुझे देखना ही बेहतर था,लगता है मुझे।

बना के घर तेरा लफ्ज़ों से, रखता हूं किताबों में,
और आती है हंसी जब सोचता हूं तेरा बचपना,
जी लेता हूं अपनी ज़िन्दगी इन्ही यादों के साए में,
और करता हूं प्यार तुझसे आज भी मैं बे-पनाह।

कि मेरे शहर से कर गई तू बेगाना मुझे।
कि मेरे शहर से कर गई तू बेगाना मुझे।

Friday, June 19, 2009

सफर अंजान..




सफर अंजान..
कि चल पड़ा हूं फिर उसी मुकाम पे,
डाल के धूल अपने ग़मों के मकान पे,
और करके अलविदा अपने ज़ख्मों के निशान से,
कि चल पड़ा हूं फिर उसी मुकाम पे।

सोचता हूं किस तरफ रुख करूं,
जबकि हवाएं भी दुशमनी निभातीं हैं,
सोचता हूं किसे बेवफा कहूं,
जबकि मौत भी नज़रें चुराती है।
कि चल पड़ा हूं फिर उसी मुकाम पे,

जब वक्त से जीत न सका तो कह दिया खुदा उसको,
और जब प्यार पे प्यार न मिला तो कह दिया बेवफा उसको,
छुड़ा के रिशतों का दामन ना जाने किस भीड़ में गुम हो जाता हूं,
कि चल पड़ा हूं फिर उसी मुकाम पे,

अपने माज़ी को लिफाफे में बंद रखता हूं,
और अपने कमरे के आइने से डरा करता हूं,
बस दूसरों के ज़ख्मों से मरहम लेता हूं,
कि चल पड़ा हूं फिर उसी मुकाम पे, कि चल पड़ा हूं फिर उसी मुकाम पे।


Tuesday, June 16, 2009






मैं कोई लेखक नहीं...मगर मैने ज़िदगी को जिन आखों से देखा है उन आंखों ने मुझे वो दिखाया जिसे मैंने अपने लफ्ज़ों में समेटने की कोशिश करी है।मेरी ये रचनाएं उन पलों में लिखी गईं हैं जब मैं एक संवेदनशील इंसान से ज़्यादा कुछ नहीं था।

तू आए तो सुकून आए दिल को,
आदत तेरी है वादे तोड़ने की,
तोड़ के दिलों को बस मुह मोड़ने की,
पर हम भी शीशे का जिगर रखतें हैं,
हो जांए चूर फिर भी चुभने का हुनर रखतें हैं,
कि अब तू आए तो सुकून आए दिल को।

तुझे देखने की हसरत पाले बैठा हूं,
अब तेरे दर पे नज़रें टिकाए बैठा हूं,
वक्त का गुलाम सही पर दूंगा मात इस कमज़र्फ को,
कि मौत के आने पर भी उससे दामन बचाए बैठा हूं,
तुझे देखने की हसरत पाले बैठा हूं।

खुद सवाल भी मैं ही हूं और जवाब भी मैं ही होता हूं,
तुझे खुदा सा पूजता हूं और लोबान भी मैं ही होता हूं,
लेता हूं नाम तेरा जब भी महफिल में,
क्या कहूं बदनाम भी मैं ही होता हूं।

उनकों याद रहे कि हम हैं,
जब वो नींद से जागें तो याद आएं उन्हें,
और वो जब छज्जे से झांकें को कहीं दिख जाएं उन्हें,
बस उन्हें याद रहे कि हम हैं।

वो जब अपनी ज़ुबान से मेरा नाम लेतें हैं,
मानों सूखी ज़मी पे बारिश सी होती है,
महक उठता है समा उससे,
और मेरी खुशी अंकुर का रूप लेती है।


तेरी झुकी नज़रें आज भी याद आतीं हैं,
वो जब भी तेरा आना और आकर शरमाना,
तेरा कांपती आवाज़ में मेरा नाम पुकारना,
फिर घबरा के मेरे पहलु में बैठ जाना,
वो बातों में प्यार वो उन आंखों में इकरार,
तेरी झुकी नज़रें आज भी याद आतीं हैं,
तेरे आते ही बदल जाता था समा सारा,
तेरे मुसकुराते ही रौशनी का वो नज़ारा,
तेरा वो आंचल को संभालना,तेरा वो दांतों में उन्गलियों को दबाना।
ना भूला हूं..ना भूल सकता हूं,
तेरा बस मुझे आंखों से छु जाना।
डर के दरवाज़ों को देखतीं उन आंखों में दिखता था डर,
कि तुझे है फिर वापस जाना,
कि तेरी झुकी नज़रें आज भी याद आतीं हैं।

आप मेरे होते तो क्या होता,
मेरा दिल झूम के गाता,
और हर झोंका तेरा ही पैगाम लाता,
मेरा सूरज तुझसे उठता,
और ये चांद तेरे तकिये पर सोता,
आप मेरे होते तो ये होता, आप मेरे होते तो ये होता।

वो जब भी मेरे पहलु में बैठतें हैं,
मुझे उनके नूर का अहसास होता है।
रौशन होता है शजर उनसे,
और उनका एक लफ्ज़ भी मानों अज़ान होता है।

मेरे लफ्ज़ों के दायरे बहुत सीमित हैं,
ये तेरी ख़बियों की उड़ान क्या पकड़ पाएंगे।
हम तो दूर से देखते हैं इस चांद को,
मेरे हाथ कहां इसे छु पाएंगे।

तुझमें एक अलग सी बात लगती है,
तेरी आंखों की चमक झील का चिराग लगती है।
तू दुनिया की सबसे हसीन तो नहीं,
फिर भी तेरी सुरत मुझे महताब लगती है।
तुझमें एक अलग सी बात लगती है।

खुदा कहता है कि वो बेरहम नहीं,
कोई फिर बता दे कि वक्त के ज़ुल्म क्या हैं।

रात तंग करने लगी है मुझको,
नींदें भी नज़रें चुरातीं हैं,
जबकि दिवारें दिलातीं हैं एहसास तनहाई का,
और बस तुम ही तुम याद आते हो।

की तू क्या जाने कि तू क्या है,
चांद को दे दी है मात तूने,
सितारे तुझे लोरियां सुनाते हैं,
आसमां बन जाता है पलंग तेरा,
और तेरी पलकें उठते ही,
सारे परींदे जाग जातें हैं,
की तू क्या जाने कि तू क्या है।

आज भी तेरा जाना मुझे याद सा है,
समा बदला नहीं मगर रौशनी का आकाल सा है,
तुमहारे साथ ही गई मुस्कुराहट अपनी,
बस चेहरा हसता है मगर,
दिल कहीं उदास सा है,
आज भी तेरा जाना मुझे याद सा है।

आज भी तेरे नाम की हिफाज़त किया करता हूं,
आज भी तेरी यादों को हरपल जिया करता हूं,
रखा है संभाल कर तेरे वजूद के इस दिल ने,
तड़पता है ये और मैं तुझे याद किया करता हूं,
आज भी तेरे नाम की हिफाज़त किया करता हूं।

जो कहते थे कि नहीं गुज़रता एक पल भी तेरे बिन,
देखो उन्होने आधी ज़िन्दागी मेरे बगैर ही गुज़ार दी,
दूर जाने पर भीगो देते थे जो आंचल अपना,
आज उन्होने मेरी शख्सियत ही मिटा दी।

आसमां को नींद आए तो उसे सुलाएं कहां,
ज़मी को मौत आए तो उसे दफनाएं कहां,
सागर में लहरें उठे तो उसे छुपाएं तो छुपाएं कहां,
और मुझे तेरी याद आए तो हम जायें तो जायें कहां।


अब बस तू आये...




अब बस तू आये...तो ये दिल झूम के गाए।
तुमको दिल की बात कही,
अपना हाल-ए-बयां कर दिया।
तुम नज़रों को समझ ना सके
और हमने तुम्हें खुदा कह दिया।
तेरे आने की उम्मीद पर बैठा हूं
की तुम आओ तो मेरी सुबह हो,
ये दिल तेरे आने से जागे और
ये सांसें तेरी घबराहट को भांपे।
पर तुम बैठे हो दूर कहीं,
मेरी यादों से बेफिक्र, जहां ना तो तुम्हे
याद हूं मैं..और ना तो कोई फरियाद हूं मैं।
बस यही सोंचता हूं रह-रह के...
कि कहीं
तुने मुझे भुला ना दिया, जिसको चाहा था कभी टूट कर,
कहीं उसने मुझे मिटा ना दिया।
अब तो यही सोचता हूं मैं,
कि जब भी बारिश आये..
तेरी गीली सी मुस्कुराहट लाए
बैठा हूं तेरी आहट पर
कि बस अब तू आये, कि बस अब तू आये




मेरी तलाश ख़त्म नहीं होती...




मेरी तलाश ख़त्म नहीं होती...
रोज़ तलाशता हूं मैं तुझे हर ज़र्रे में..
कुरेद के लकीरों को अपनी ढ़ूंढ़ता हूं मैं तेरा नाम।
मगर मेरी तलाश है कि ख़त्म नहीं होती।
ज़िदगी की भीड़ में तलाशता हूं तुझे मैं..
पर जब देखता हूं अक्स मेरा तो आती तू नज़र है..
बढ़ा के हांथ जब करता हूं महसूस तुझे ..
तो हस्ता है अक्स मेंरा कि ये मेरा ही वजूद है..
मगर मेरी तलाश है कि ख़त्म नहीं होती।
सूरज की तपिश में देखकर आसमां को
करता हूं फरियाद यही की तेरा पता क्या है..
खुदा गर बेरहम नहीं तो मेरी फिर खता क्या है..
बस भटके मुसाफिर सा फिरता हूं यहां वहां ..
मगर मेरी तलाश है कि ख़त्म नहीं होती।
भीड़ में जिंदगी की मिलते हैं कई चहरे
मगर तेरा चेहरा अबतक ना बना सका मैं
कहतें है कलाकार को आंखों की जरूरत नहीं होती
पर अपनी कला में तुझे समा ना सका मैं
मगर मेरी तलाश है कि ख़त्म नहीं होती।
अपने लफज़ों के दायरे में समेटता हूं तेरी खूबियां
कि मुझसे तो मेरी तकदीर नहीं बनती
आब में क्या कहूं कि मेरी ये तलाश ख़त्म नहीं होती।

Saturday, May 16, 2009

यूपीए की जय हो...



यूपीए की जय हो...
जहां एक तरफ जय हो ..गाने को गाकर भारत के चर्चित संगीतकार ए.आर रेहमान ने ऑस्कर जीता वहीं इस गाने को अपना चुनावी नारा बनाने वाली यूपीए ने लोकसभा इलेक्शन की बाज़ी मार ली।बीजेपी ने कभी सपने में भी नहीं सोचा होगा कि इलेक्शन के जब रिज़ल्ट्स आएंगे तो ये हशर होगा कि यूपीए इतने भारी अंतर से जीतेगी।चौकांने वाले परीणामों ने बीजेपी की तो बोलती बंद कर ही दी साथ ही में माक्सवादीयों ने भी अपने गुठने टेक दिए।कॉन्ग्रेस का वो जादू चला की एक दशक बाद उसे पूर्ण बहुमत का सुख प्राप्त होगा।अब बात आती है कि आखिरकार कौन है कॉन्ग्रेस की इस विजय का मुख्य कारण?तो सबसे पहले नाम सामने आता है पार्टी के स्टार्स का..और एक ही नाम सबके ज़हन में आता है और वो है..गांधी वंश के चशमों चिराग..पार्टी के यूवराज..यानी राहूल गांधी..राहुल गांधी का जादू इस इलेक्शन में जनता के सिर चढ़कर बोला और राहुल के साथ साथ उनकी इकलौती बहन और जो किसी राजकुमारी से कम नहीं प्रियांका ने भी रैलियों में खूब भीड़ बटोरी।यानी जो समीकरण निकल के आए वो तकरीबन वहीं हैं जो इंदरा गांधी के समय हुआ करते थे।गांधी परिवार का एक छत्र राज।पूरे वर्चस्व का अनंद उठाते हुए सोनिया गांधी ने इस इलेक्शन में अपने दोनों चशमों चिराग को पार्टी हित के लिए जनता के बीच ला खड़ा किया और परिणाम आपके सामने है।सूरज की तपीश में रैलीयां और एक सूती साड़ी में स्टाइल की नई पराकाष्टा बनाने वाली प्रियांका गांधी ने आम आदमी को इतना रिझाया कि वोट डालते वक्त उसको बीजेपी का कमल तो नज़र ही नहीं आया।हां भले ही बीजेपी के भय हो की कोशिश जरूर जनता को ज़रा लुभा गई मगर भीजेपी उससे वोट काटने में नाकाम ही साबित हुई।बीजेपी के कई गद्दावर नेता ताश के पत्तों की भाती गिर गए और जो बहुबली इस इलेक्शन में ये सोच के उतरे थे कि उनके तमंचे का डर यहां भी जादू चलाएगा..तो वो भाई साहब फेल हो गया।मगर गुरु जनता अब समझदार हो गई है।आज के यूवा को पप्पू की संज्ञा देने वालों को ये तो समझ आ ही गया होगा कि पप्पू डांस भले ही ना कर सके मगर अपना वोट बड़ी समझदारी से डाल सकता है।

Thursday, April 16, 2009


आया इलेक्शन झूम के
लो भईया इलेक्शन आने वालें हैं..और अब मज़ा आएगा। कहते हैं चुनाव एक परिवर्तन की आंधी की तरह आता है लेकिन विनाश करके चला जाता है। आप जरूर बैठे होंगे नज़रें टिकाएं की एक नया नेता आएगा और आपके सारे दुख हर ले जाएगा। मगर जैसा कि भारत का इतिहास रहा है नेता नहीं बदलने वाले..हां उनकी नेतागिरी जरूर बदलती रहती है। इस बार के लोकसभा इलेक्शन में आप इन नेतओं की नौटंकी रोज़ टीवी चैनल्स पर देख ही रहे होंगे। इन नेताओं के पास हमेशा की तरह एक ही मुद्दा है जिसको ये इस बार भी इलेक्शन का आधार मान रहें हैं और वो है एक दूसरे की पतलून उतारना..। वैसे हम इससे भी खराब शब्द का इस्तेमाल कर सकतें हैं..इन नेताओं को जरा भी बूरा नहीं लगेगा। वजह जानना चाहेंगे..क्योंकि आया इलेक्शन झूम के..फिलहाल इस बार के इलेक्शन में कुछ चीजें बड़ी ही एक्सक्लूसिव है..जैसे कि कॉन्ग्रेस का जय हो और बीजेपी का भय हो..मगर इस नए तरीके में भी आपको सिर्फ आपसी जलन की बू ही आएगी। हां अगर आप टीवी पर नेताओं के बयान सुन रहें हैं..तो घर के ड्राईंगरूम में बैठकर आप बीवी से इन्हें दिल खोलकर गाली जरूर दे सकते हैं क्योंकि इससे ज्यादा तो आप कुछ कर भी नहीं सकते। इलेक्शन के दिन को महज छुट्टी का दिन मानने वाले लोगों के लिए तो खास तौर पर इस इलेक्शन में कुछ विशेष नहीं रखा क्योंकि ये बुद्धिजीवी वर्ग सूरज की तपिश में वोट देने तो इस बार भी नहीं जाने वाला। हां एक बात जरूर है जूता जरूर चला सकता है। जूते का इससे बेहतर इस्तेमाल शायद ही पहले हुआ हो। देश के क्रांतिकारी होते तो जरूर सोचते की जिस लड़ाई को हमने लाठी खाकर जीता..उससे बेहतर तो शायद भरी सभा में एक जूता चलाकर भी हासिल किया जा सकता था। फिलहाल..जॉर्ज बूश पर चले जूते का कमाल भारत आते आते ज़रा लेट जरूर हो गया पर भईया आया समय पर..गृहमंत्री पर चले जूते ने कई विरोधों को भी पीछे छोड़ दिया। इस एक्सक्लूसिव विरोध प्रणाली ने देश के नेताओं को ये जरूर बता दिया कि एक आम आदमी कुछ भले ही ना कर सके..एक जूता जरूर चला सकता है। और खास कर तब जब नेता जी किसी सभा में कई कैमरों की हद में हों। अब आपको ये बताने की शायद जरूरत नहीं की नेता जी पर जूता चलना किसी भी भूखे चैनल के लिए कितनी बड़ी ब्रेकिंग न्यूज़ है। जूता चलने की घटना को रिपीट करके दिखाना तो चैनलों का एक्सक्लूसिव ट्रीटमेंट है। बहरहाल, चिदंबरम साहब जो कभी देश का वित्त मंत्रालय देखा करते थे उन्होने कभी सपने में भी नहीं सोंचा होगा की गृहमंत्रालय मिलने के बाद भईया जूते भी खाने होंगे। गृहमंत्री इस जूता चलाने की घटना को बड़ी आसानी से पचा भी गए। जानते हैं क्यों..आप जानते तो हैं..क्योंकि आया इलेक्शन झूम के।

खैर...अभी इलेक्शन की गुफ्तगू ख़त्म नहीं हुई जनाब..दूसरे लेख में आपको जूते का एक और कांड बताउंगा..क्योंकि जूते की क्रांति लाने वाली जमात में मैं भी शामिल हूं..और लेख लिखते लिखते हमारे प्रोड्यूसर साहब ने एक खबर लिखने को पकड़ा दी है। आप इन नेताओं की नौटंकियों पर नज़र बनाए रखिए क्योंकी इससे बड़ा रियाल्टी शो आपको किसी भी चैनल पर नहीं मिलने वाला।